इंटरनेशनल

अजब गजब: यहां त्योहार पर लाशें पहनती हैं नए कपड़े, मनाती हैं जश्न

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
848
| सितंबर 23 , 2017 , 16:53 IST

अपनों से प्रेम भला कौन नहीं करता। हालांकि ये प्रेम अपनों के मर जाने के कुछ ही समय बाद हवा हो जाता है। अपनों के मरने के बाद या तो हम शव को जला देते हैं या फिर दफना देते हैं, या फिर कहीं-कहीं कुछ आैर तरह के रीति रिवाज भी हैं। वहीं इंडोनेशिया के एक गांव में लोग एक फेस्टिवल मनाते हैं जिसमें वो अपने परिजन के दफनाए हुए शव को फिर से निकालते हैं। इतना ही नहीं वो लाशों को निकालकर उस सजाते हैं और अच्छे-अच्छे कपड़े पहनाते हैं और उन्हें तैयार करते हैं।

ये अनोखी परंपरा इन जनजातियों के लिए उत्सव का मायने रखती है। इस त्योहार का नाम मा’नेने फेस्ट‍िवल है सुनने में अजीब लगने वाली ये परंपरा इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी की टोराजा जनजाति में निभाई जाती है। जिसमें सुलावेसी द्वीप के लोग अपने परिजनों को जमीन से निकालते हैं। इस त्यौहार का मतलब लाशों की सफाई का त्यौहार है।

शवों को पहनाते हैं कपड़े-

ये लोग इसे एक त्यौहार की तरह मनाते हैं। तीन दिन तक चलने वाले इस जश्न में शवों को कब्र से निकालकर उन्हें धूप में सूखने के लिए रखा जाता है। इसके बाद उन्हें नहला कर अच्छे और सुंदर कपड़े पहनाए जाते हैं।

इन शवों के साथ ये लोग ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे ये जिंदा इंसान हों। चमचमाते शवों को इसके बाद उनके परिवार वाले सड़क पर घुमाने लेकर जाते हैं। यहां तक कि ये लोग इस परम्परा के दौरान मृत बच्चों के शवों को कब्र से बाहर निकाला जाता है और बच्चे के कंकाल को नहला कर उसे भी अच्छे कपड़े पहनाए जाते हैं। लेकिन इस दौरान बच्चे के शरीर के पास एक गुड़िया को अच्छे कपड़े पहनाकर बच्चे के शव के पास रखी जाती है।

लेते हैं शवों से आशीर्वाद-

ये लोग शवों को इस तरह से सजाते हैं कि उनके चेहरे मुस्कुराते हुए दिखें। अपने पूर्वजों से जुड़ने का ये समय इन लोगों के लिए खास मायने रखता है। उन्हें श्रद्धांजलि देकर ये लोग उनसे अच्छी फसल होने का आशीर्वाद लेते हैं। शवों को शहर भर में घुमाने के बाद गांव वाले भैंसों की बलि देते हैं ताकि इनके पूर्वजों को जन्नत नसीब हो।

सदियों पुरानी है ये परंपरा-

आदिवासियों की यह परंपरा सदियों पुरानी है, यह परम्परा एक शिकारी के सड़क किनारे पड़े शव को अपने कपड़े पहना कर दफना देने के साथ शुरू हुई थी। मान्यता है कि इसके बाद से उस शिकारी की जिंदगी ही बदल गई और उसके पास काफी धन-दौलत आ गई। इसके बाद से इस जनजाति के लोग इस परंपरा को मानने लगे।

बताया जाता है कि इस दौरान घर में कई तरह के पकवान बनते हैं और उस लाश को भोग के रुप में ये चढ़ाया जाता है।

कहा जाता है कि यह त्योहार करीब 100 सालों से मनाया जा रहा है। साथ ही शव को खराब होने से बचाने के लिए भी कई उपाय अपनाए जाते हैं।


author
अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

कमेंट करें