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इस स्कूल में पढ़ती हैं 55 से लेकर 90 साल की छात्राएं (बुजुर्ग पाठशाला की कहानी)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| फरवरी 6 , 2017 , 08:17 IST

महाराष्ट्र के ठाणे स्थित फागणे गांव के आजीबाइची शाला (दादी-नानी, मां का स्कूल) में आपका स्वागत है। बुजुर्ग महिला और उनके साथ बच्ची, दोनों के हाथ में स्कूल बैग। चकित मत होइए। यह बुजुर्ग महिला स्कूल में पढ़ने जा रही है। ठाणे के फागणे गांव का यह अनूठा स्कूल बुजुर्ग महिलाओं का स्कूल हैं जहां लगभग 30 बुजुर्ग महिलाएं रोज दो घंटे स्कूल में पढ़ने-लिखने आती हैं।

गांव में शत प्रतिशत साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करने के मकसद से अनपढ़ बुजुर्ग महिलाओं के लिए यह खास स्कूल खोला गया है। प्रति दिन दो घंटे की क्लास लगती है इस स्कूल में। इस स्कूल का अपना यूनिफॉर्म भी है। यहां सभी बुजुर्ग महिलाएं गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर स्कूल में आती हैं। स्कूल में पढ़ रही सभी बुजुर्ग महिलाओं की उम्र 55 से 90 साल के बीच है।

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गांव के ही एक टीचर योगेंद्र बांगर ने इस स्कूल की स्थापना की है। इस स्कूल के प्रबंधन का जिम्मा मोतीराम दलाल चैरिटेबल ट्रस्ट के हाथ में है। ट्रस्ट के फाउंडर दिलीप दलाल कहते हैं कि बुजुर्ग महिलाओं के प्रति समाज में प्यार और सम्मान की भावना जगे इसीलिए उन्होंने इस स्कूल की स्थापना की है।

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स्कूल के टीचर योगेंद्र बांगर कहते हैं कि हमने इस स्कूल के गेट के आगे हिन्दी वर्णमाला के पोस्टर चिपका रखे हैं ताकि यहां पढ़ने वाली बुजुर्ग महिलाएं समझ सकें कि वो यहां पढने आई हैं। यहां पढ़ने वाली हर बुजुर्ग महिलाओं को एक पेड़ की देखभाल भी करनी होती है।

स्कूल की एक टीचर शीतल मोरे बताती हैं कि 'पहले ये महिलाएं पढ़ाई के नाम पर हंसते हुए कहती थीं- हमें बोर्ड पर लिखा दिखाई देगा? अब ये सभी अंगूठा नहीं लगातीं, साइन करती हैं।' यह हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। एक बुजुर्ग बताती हैं, 'मैं अब जानती हूं कि मुझे मेरा नाम कैसे लिखना है, हस्ताक्षर कैसे करने हैं। हम सब यहां पढ़ने आते हैं।'

स्कूल में पढ़ रही  87 साल की बुजुर्ग महिला रामबाई गणपत चांदले स्कूल में दाखिले के बाद काफी खुश नजर आ रही हैं। वो कहती हैं कि बचपन में वो स्कूल नहीं जा सकीं, इसका मलाल उन्हें जीवन भर रहा लेकिन मैं अनपढ़ मरना नहीं चाहती थी। अब मैं खुश हूं कि मरने से पहले मैं दो अक्षर लिखना और पढ़ना सीख जाउंगी। 


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