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'गीत नया गाता हूँ...' पढ़ें अटल बिहारी वाजपेयी की 5 सबसे मशहूर कविताएं

दीपक गुप्ता, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 2
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| अगस्त 16 , 2018 , 14:07 IST

पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को जितना एक राजनेता के तौर पर सराहा गया, उतना ही प्यार उनकी कविताओं को भी मिला। उनकी कविताएं उनके बेबाक व्यक्तित्व की पहचान बन गईं। आइये देखते हैं अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी हुई 5 कविताएं।

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1. गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर ,

पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,

झरे सब पीले पात,

कोयल की कूक रात,

प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं।

गीत नया गाता हूँ।

टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी?

अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।

हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ।

गीत नया गाता हूँ।

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2. आओ फिर से दिया जलाएं

भरी दुपहरी में अँधियारा,

सूरज परछाई से हरा,

अंतरतम का नेह निचोड़े, बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएं।

हम पड़ाव को समझें मंजिल,

लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल,

वर्तमान के मोहजाल में, आने वाला कल न भुलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएं।

आहूति बाकी यज्ञ अधूरा,

अपनों के विघ्नों ने घेरा,

अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ।

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3. गीत नहीं गाता हूँ

बेनकाब चेहरे हैं,

दाग बड़े गहरे है,

टूटता तिलस्म , आज सच से भय खाता हूँ।

गीत नहीं गाता हूँ।

लगी कुछ ऐसी नज़र,

बिखरा शीशे सा शहर,

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ।

गीत नहीं गाता हूँ।

पीठ में छुरी सा चाँद,

राहु गया रेख फाँद,

मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ।

गीत नहीं गाता हूँ।

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4. दूध में दरार पड़ गई

खून क्यों सफेद हो गया?

भेद में अभेद खो गया।

बंट गये शहीद, गीत कट गए,

कलेजे में कटार दड़ गई।

दूध में दरार पड़ गई।

खेतों में बारूदी गंध,

टूट गये नानक के छंद

सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।

वसंत से बहार झड़ गई

दूध में दरार पड़ गई।

अपनी ही छाया से बैर,

गले लगने लगे हैं ग़ैर,

ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।

बात बनाएं, बिगड़ गई।

दूध में दरार पड़ गई।

Atal-Bihari-Vajpayee_PTI15. मौत से ठन गई

ठन गई

मौत से ठन गई.

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,

लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई

मौत से ठन गई


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Beautiful poyam

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