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सियासी पार्टियों को मिले विदेशी चंदे की अब नहीं हो सकेगी जांच, बिना बहस के बिल पास

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मार्च 19 , 2018 , 17:03 IST

विदेशी चंदे पर सियासी दलों को छानबीन से छूट देने वाला बिल बुधवार को लोकसभा में शोरगुल के बीच बिना चर्चा के पास हो गया। राजनीतिक दल विदेशों से ये चंदे 1976 से प्राप्त कर रहे हैं। इस बिल के पास होने से कांग्रेस व भाजपा सहित अन्य दलों को फायदा होगा।

लोकसभा ने बुधवार को विपक्षी दलों के विरोध के बीच वित्त विधेयक 2018 में 21 संशोधनों को मंजूरी दे दी। इनमें से एक फॉरन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेग्युलेशन) ऐक्ट 2010 (FCRA) में संशोधन भी शामिल था। यह ऐक्ट विदेशी कॉरपोरेशन को राजनीतिक दलों को केंद्र सरकार ने फाइनैंस बिल 2016 में FCRA में भी संशोधन किया है जिससे अब राजनीतिक दल आसानी से विदेशी चंदा ले सकेंगे।

इसके अलावा सरकार ने यह संशोधन भी किया है कि 1976 से अब तक पार्टियों को दिए गए फंड की जांच नहीं की जा सकती है। इस पूर्व प्रभावी संशोधन के बाद बीजेपी और कांग्रेस को 2014 के दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले से राहत मिल जाएगी जिसमें इन दोनों ही पार्टियों को FCRA का उल्लंघन करने का दोषी माना गया था।

FCRA को साल 1976 में पास किया गया था जिसमें यह कहा गया था कि ऐसी भारतीय या विदेशी कंपनियां जो विदेश में रजिस्टर्ड हैं राजनीतिक पार्टियों को चंदा नहीं दे सकतीं। हालांकि इस बिल को बाद में FCRA, 2010 के जरिए निरस्त कर दिया गया था।

बीजेपी सरकार ने फाइनैंस ऐक्ट, 2016 में फॉरन कंपनी की यह कहते हुए परिभाषा बदल दी है कि जिस कंपनी में 50 पर्सेंट से कम विदेशी कैपिटल होगा उसे फॉरन कंपनी नहीं माना जाएगा। यह संशोधन सितंबर 2010 से लागू माना जाएगा। इस संशोधन से पहले 26 सितंबर, 2010 से पहले लिए हुए विदेशी चंदे की जांच की जा सकती थी। बता दें कि वर्तमान संसद के बजट सत्र में अब केवल 3 हफ्ते का समय बचा है और इसे बिना बहस के पास कर दिया गया है। साल 2000 से यह तीसरा मौका है जब बजट बिना बहस के पास हुआ है।

लोकसभा की वेबसाइट पर वित्त विधेयक 2018 के सभी पारित संशोधनों का ब्यौरा दिया गया है। एफसीआरए से संबंधित संशोधन ब्यौरे में कहा गया है कि वित्त अधिनियम 2016, धारा 236 के पहले पैराग्राफ में २६ सितंबर 2010 के स्थान पर 5 अगस्त 1976 को शामिल किया जाएगा। इस संशोधन से पहले राजनीतिक दलों के 26 सितंबर 2010 के पहले मिले विदेशी चंदे की जांच हो सकती थी। वहीं अधिनियम के पारित होने जाने के बाद अब इसकी संभावना भी खत्म हो गई है।


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