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'लालबाग के राजा' की शान है इस बार निराली, देखिए पहली झलक

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| सितंबर 13 , 2018 , 14:10 IST

भगवान श्री गणेश के आगमन का महोत्सव बड़े ही घूमधाम से पूरे देश में मनाया जा रहा है। मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में इस पर्व का बड़ा ही महत्व है। मुंबई में इस दौरान कई गणेश पंडाल लगाए जाते हैं जिनमें सबसे प्रसिद्ध है लालबागचा राजा पंडाल। हर बार की तरह इस बार भी लालबागचा राजा का पंडाल को बड़े भव्य तरीके से सजाया गया।

लालबाग का राजा करते हैं सभी मनोकामना पूर्ण

लालबागचा राजा कितने लोकप्रिय हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके दर्शन के लिए श्रद्धालु लंबी-लंबी कतारों में घंटों इंतजार करते हैं। दरअसल यह माना जाता है कि यहां के गणेश प्रतिमा के दर्शन करने मात्र से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

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अभिनेता से लेकर राजनेता तक नवाते हैं सिर

मुंबई में लालबागचा राजा के दरबार में राजनेता से लेकर अभिनेता तक सभी सिर नवाते हैं। सुख, सम्मान, ऊंचाई, पद और सफलता की चाह में साधारण से लेकर असाधारण लोग राजा के दर्शन के लिए कई किलोमीटर लंबी यात्रा पूरी कर यहां पहुंचते हैं। घंटों कतार में खड़े रहकर राजा गणेश के दर्शन कर श्रद्धालु धन्य हो जाते हैं। कोई मन्नत पूरी करने पर राजा का आभार मानता है तो कोई नई कामना करता है।

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1934 में सार्वजनिक मंडल की हुई थी स्थापना

‘लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल’ की प्रसिद्ध प्रतिमा है। इस मंडल को पहले सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल, लालबाग के नाम से जाना जाता था। वर्तमान मंडल की स्थापना 1934 में की गई थी। इस मंडल की स्थापना तब की गई जब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था। इस पंडाल की स्थापना के पीछे एक प्रतिज्ञा का हाथ है जिसे यहां के मछुआरों और विक्रेताओं ने लिया था। लालबाग मार्केट पहले पेरु चाल में स्थित था लेकिन 1932 में इसे बंद कर दिया गया। तब यहां के खुले स्थानों में बैठने वाले मछुआरों और विक्रेताओं ने भगवान गणेश के सामने प्रण लिया वो एक स्थाई मार्केट बनवाएंगे और उनकी प्रतिमा को स्थापित करेंगे।

मछुआऱों और स्थानीय व्यापारियों ने मिलकर पहली प्रतिमा स्थापित की

इस प्रण का नतीजा है कि मछुआरों और स्थानीय व्यापारियों ने मिलकर 12 सितंबर 1934 को गणेश की प्रतिमा स्थापित की। तब से लेकर आज तक लालबागचा राजा अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ति करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं। मुंबई के ‘लालबागचा राजा’ की लोकप्रियता कितनी है, इसका एक अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि लालबागचा राजा का बीमा करोड़ों में कराया जाता है। 2011 में लालबागचा राजा का 14 करोड़ रुपये का बीमा कराया गया था।

राजा को करोड़ों का चढ़ावा

लालबागचा के दर्शन करने श्रद्धालु दूर-दराज से यहां पहुंचते हैं और मन्नत पूरा होने पर दिल खोल कर ‘दान हुंडी’ में चढ़ावा देते हैं। 2011 में दान हुंडी 27 जगहों पर रखे गए थे। लालबाग के राजा को भक्त सोने और चांदी से बने गुलाब के फूल-मोदक और मूषक चढ़ाते हैं। गणोशोत्सव के दौरान ‘लालबाग के राजा’ को करोड़ों का चढ़ावा मिलता है जिसकी बाद में नीलामी की जाती है। ये नीलामी गणेशोत्सव के बाद भी जारी रहती है।

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लालबाग के राजा के चरण से सिंदूर लेना नहीं भूलें

मान्यता है कि लालबागचा राजा के दर्शन मात्र से ही सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इसके साथ ही धार्मिक आस्था यह भी है कि लालबागचा राजा के चरण का सिंदूर हर मनोरथ और कामना को पूर्ण कर देता है। अतः कोई भक्त लालबागचा राजा के चरण से सिंदूर लेना नहीं भूलता। लालबागचा राजा की विशालता, वैभव के दर्शन कर जहां गरीब व्यक्ति भी खुद को संपन्न महसूस करता है, वहीं अमीर व्यक्ति स्वयं का वैभव भूलकर नतमस्तक हो जाता है।

विसर्जन

लालबागचा राजा की विदाई से कुछ समय पहले राजा के दरबार बंद कर दिए जाते हैं। सुबह करीब ग्यारह बजे लालबागचा राजा की मंगल आरती होती है इसके बाद राजा की सवारी निकाली जाती हैं। परंपरा के मुताबिक लालबाग के राजा की सवारी को लोग हाथ से खींचते हुए विसर्जन स्थल तक ले जाते हैं। ‘गणपति बप्पा मोरया और अगले बरस तू जल्दी आ’ के नारे लगाते मुंबईकरों के लिए यह दिन बेहद खास होता है। करीब पंद्रह किलोमीटर का सफर पूरा करके लालबाग के राजा गिरगांव चौपाटी पहुंचते हैं। लोगों में इस महोत्सव को लेकर इतना उत्साह होता है कि जहां देखो वहीं श्रद्धालुओं की भीड़-ही-भीड़ नजर आती है। श्रद्धालु गणपति विसर्जन में शामिल हो सकें इसके लिए पश्चिम रेलवे और बेस्ट ने भी विशेष इंतजाम करते हैं। इस दौरान मुंबई की आबोहवा में ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष गूंज उठता है।

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भायकुला रेलवे स्टेशन के समीप रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग भी ‘लालबाग के राजा’ के विसर्जन में शामिल होते हैं। धार्मिक बंधनों को तोड़ता यह विसर्जन हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी बनता है। इस विसर्जन में लोग मुंबई के सुदूर अंबरनाथ तक से आते हैं।

 

 

 

 


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