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आजादी के दिन लाल किले पर तान छेड़ने वाले बिस्मिल्लाह खान को गूगल ने ऐसे दी श्रद्धांजलि

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मार्च 21 , 2018 , 16:14 IST

भारत रत्न शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का 21 मार्च को 102वां जन्मदिवस है। इस मौके पर गूगल ने खास डूडल बनाकर उन्हें याद किया है।गूगल के होमपेज पर बने इस डूडल को चेन्नई के कलाकार विजय कृष ने बनाया है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को किसी परिचय की जरूरत नहीं हैं। उन्होंने देश-दुनिया में शहनाई वादन को एक नया मुकाम दिलाया।

उन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया में अपना अलग मुकाम बनाया। उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री, तानसेन समेत दर्जनों अवॉर्ड्स से नवाजा जा चुका है। वह तीसरे भारतीय संगीतकार थे, जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। आजादी के दिन लाल किले और पहले गणतंत्र दिवस पर शहनाई बजाने से लेकर उन्होंने हर बड़ी महफिल में तान छेड़ी।

गूगल डूडल में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को एक सफेद रंग की पोशाक पहनकर, शहनाई बजाते हुए दिखा गया है। जिसके पार्श्व में एक ज्यामितीय स्टाइल में एक पैटर्न है और Google लिखा हुआ है। उनकी शहनाई से एक धुन निकल रही है जिसे दुनिया भर में सुना जा रहा है।

ऐसे पड़ा 'बिस्मिल्लाह' नाम-

बिस्मिल्लाह खां का जन्म बिहारी मुस्लिम परिवार में पैगंबर खां और मिट्ठन बाई के यहां बिहार के डुमरांव में हुआ था। उस दिन उनके पिता पैगंबर बख्श राज दरबार में शहनाई बजाने के लिए घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे कि तभी उनके कानों में एक बच्चे की किलकारी सुनाई दी। अनायास सुखद एहसास के साथ उनके मुंह से 'बिस्मिल्लाह' शब्द ही निकला। उन्होंने अल्लाह के प्रति आभार व्यक्त किया। हालांकि, उनका बचपन का नाम कमरुद्दीन था, लेकिन वह बिस्मिल्लाह के नाम से जाने गए।

बहुत कम उम्र में ही उन्होंने ठुमरी, छैती, कजरी और स्वानी जैसी कई विधाओं को सीख लिया था। बाद में उन्होंने ख्याल म्यूज़िक की पढ़ाई भी की और कई सारे राग में निपुणता हासिल कर ली।

6 साल की उम्र में आए बनारस-

बिस्मिल्लाह के खानदान के लोग दरबारी राग बजाने में माहिर थे, जो बिहार की भोजपुर रियासत में अपने संगीत का हुनर दिखाने के लिये अक्सर जाया करते थे। उनके पिता बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाया करते थे। 6 साल की उम्र में बिस्मिल्ला खां अपने पिता के साथ बनारस आ गये। वहां उन्होंने अपने मामा अली बख्श 'विलायती' से शहनाई बजाना सीखा। उनके उस्ताद मामा 'विलायती' विश्वनाथ मन्दिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन का काम करते थे।

शहनाई' थी उनकी दूसरी बेगम-

उस्ताद का निकाह 16 साल की उम्र में मुग्गन खानम के साथ हुआ, जो उनके मामू सादिक अली की दूसरी बेटी थी। उनसे उन्हें 9 संताने हुई। वह हमेशा एक बेहतर पति साबित हुए। वह अपनी बेगम से बेहद प्यार करते थे, लेकिन शहनाई को भी अपनी दूसरी बेगम कहते थे। 66 लोगों का परिवार था, जिसका वह भरण-पोषण करते थे। अपने घर को कई बार बिस्मिल्लाह होटल भी कहते थे। लगातार 30-35 सालों तक साधना, छह घंटे का रोज रियाज उनकी दिनचर्या में शामिल था। अलीबख्श मामू के निधन के बाद खां साहब ने अकेले ही 60 साल तक इस साज को बुलंदियों तक पहुंचाया।

बिस्मिल्लाह खां भले ही शिया मुसलमान थे, फिर भी वह अन्य हिन्दुस्तानी संगीतकारों की तरह धार्मिक रीति रिवाजों के प्रबल पक्षधर थे। वह काशी के बाबा विश्वनाथ मंदिर में जाकर तो शहनाई बजाते ही थे, इसके अलावा गंगा किनारे बैठकर घंटों रियाज भी किया करते थे। वह पांच बार के नमाजी थे, हमेशा त्यौहारों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। लोग बताते हैं कि वह बनारस छोड़ने के ख्याल से ही इस कारण व्यथित होते थे कि गंगाजी और काशी विश्वनाथ से दूर नहीं रह सकते थे।

फिल्मों से रहा गहरा नाता-

बिस्मिल्लाह खान का फिल्मों से गहरा संबंध था। उन्होंने सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसा घर’ में काम किया। वर्ष 1959 में आयी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ में उन्होंने शहनाई की धुन दी थी।1967 की फिल्म ‘दि ग्रेजुएट’ में एक पोस्टर भी था, जिसमें बिस्मिल्लाह खान के साथ 7 संगीतकारों को भी दर्शाया गया था।

भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान -

2001 में देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न पाने वाले वह तीसरे क्लासिकल म्यूज़िशयन बने।1968 में उन्हें पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण और 1961 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उस्ताद ने 14 साल की उम्र में सार्वजनिक जगहों पर शहनाई वादन शुरू कर दिया था। हालांकि, 1937 में कोलकाता में इंडियन म्यूज़िक कॉन्फ्रेंस में उनकी परफॉर्मेंस से उन्हें देशभर में पहचान मिली। 1938 में लखनऊ में ऑन इंडिया रेडियो की शुरुआत उनके लिए बड़ा ब्रेक साबित हुई। इसके बाद उनकी शहनाई को अक्सर रेडियो पर सुना जा सकता था। खान ने एडिनबर्ग म्यूज़िक फेस्टिवल में भी परफॉर्म किया था, इससे उन्हें दुनिया में ख्याति मिली।

आजादी के बाद, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसी शख्सियतों के सामने शहनाई बजाने वाले वह पहले भारतीय शहनाई वादक बने। 21 अगस्त 2006 में उनकी मृत्यु हो गई।


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