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19वीं सदी में तिब्बत को दुनिया के सामने लाए नैन सिंह रावत, गूगल ने बनाया डूडल

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 21 , 2017 , 13:40 IST

गूगल ने 19वीं सदी के भारतीय खोजी नैन सिंह रावत के उपलब्धियों और उनके 187वें जन्मदिन का जश्न शनिवार को डूडल के साथ मनाया। वह तिब्बत का सर्वेक्षण करने वाले पहले व्यक्ति थे। तिब्बती भिक्षु के रूप में प्रसिद्ध रावत कुमाऊं क्षेत्र के अपने घर से काठमांडू, ल्हासा और तवांग तक गए।

ब्रिटिश 19वीं शताब्दी में तिब्बत का नक्शा बनाना चाहते थे लेकिन उस समय यूरोपीय लोगों का हर जगह स्वागत नहीं हुआ करता था।

रावत भौगोलिक अंवेषण में प्रशिक्षित, उच्च शिक्षित और बहादुर स्थानीय पुरुषों में से एक थे।

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उन्होंने ल्हासा के सटीक स्थान और ऊंचाई को निर्धारित किया, त्सांगपो का नक्शा बनाया और थोक जालुंग की सोने की खदानों के बारे में बताया।

गूगल ने कहा, "उन्होंने एक सटीक माप गति को बनाए रखा। उन्होंने 2000 चरणों में एक मील को पूरा किया और एक माला का उपयोग करके उन चरणों को मापा। उन्होंने अपनी प्रार्थना चक्र और कौड़ी के खोल में एक कंपास छिपाया और यहां तक लोगों के एक भिक्षु के रूप में भ्रम में भी डाले रखा।"

शनिवार को गूगल के डूडल में रावत को चित्रित किया। उन्होंने एक अकेले और साहसी व्यक्ति को दूर तक देखते हुए दिखाया है। व्यक्ति के हाथ में माला है औ उसके पास एक लाठी भी रखी हुई है।

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नैन सिंह रावत का इतिहास 

(1830-1895) १९वीं शताब्दी के उन पण्डितों में से थे जिन्होने अंग्रेजों के लिये हिमालय के क्षेत्रों की खोजबीन की। नैन सिंह कुमायूँ घाटी के रहने वाले थे। उन्होने नेपाल से होते हुए तिब्बत तक के व्यापारिक मार्ग का मानचित्रण किया। उन्होने ही सबसे पहले ल्हासा की स्थिति तथा ऊँचाई ज्ञात की और तिब्बत से बहने वाली मुख्य नदी त्सांगपो (Tsangpo) के बहुत बड़े भाग का मानचित्रण भी किया।

पंडित नैन सिंह रावत का जन्म पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी तहसील स्थित मिलम गांव में 21 अक्तूबर 1830 को हुआ था। उनके पिता अमर सिंह को लोग लाटा बुढा के नाम से जानते थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हासिल की लेकिन आर्थिक तंगी के कारण जल्द ही पिता के साथ भारत और तिब्बत के बीच चलने वाले पारंपरिक व्यापार से जुड़ गये। इससे उन्हें अपने पिता के साथ तिब्बत के कई स्थानों पर जाने और उन्हें समझने का मौका मिला। उन्होंने तिब्बती भाषा सीखी जिससे आगे उन्हें काफी मदद मिली। हिन्दी और तिब्बती के अलावा उन्हें फारसी और अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था। इस महान अन्वेषक, सर्वेक्षक और मानचित्रकार ने अपनी यात्राओं की डायरियां भी तैयार की थी। उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकतर समय खोज और मानचित्र तैयार करने में बिताया।

 केदारनाथ (6)


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