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इस एक्ट्रेस की वजह से टूटी थी गुरु दत्त की शादी, 39 की उम्र में किया था सुसाइड (जयंती विशेष)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जुलाई 9 , 2018 , 13:52 IST

अभिनेता गुरु दत्त का नाम हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में शुमार है जिन्होंने सिर्फ अपनी एक्टिंग से ही नहीं बल्कि डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के रूप में भी पहचान बनाई। गुरु दत्त का नाम दिमाग में आते ही हिंदी फिल्म जगत की बेहतरीन फिल्में याद आने लगती हैं।

गुरु दत्त का जन्म 9 जुलाई 1925 को बेंगलुरु में हुआ था। उनका असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। गुरु दत्त का जन्म बेहद गरीबी और तकलीफों में बीता था। पढ़ाई में अच्छे होने के बावजूद 10वीं के बाद वो आगे नहीं पढ़ सके क्योंकि उतने पैसे उनके परिवार के पास नहीं थे। उनका बचपन बेहद कष्टमय रहा। पढ़ाई में अच्छे होने के बावजूद परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वह कभी कॉलेज नहीं जा सके लेकिन कला के क्षेत्र में कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने विश्वस्तरीय फिल्म निर्माता और निर्देशक के रूप में पहचान बनाई। साहित्य में उनकी रुचि थी और संगीत की उन्हें अच्छी समझ थी, जिसकी झलक उनकी सभी फिल्मों में दिखती है।

बॉलीवुड में गुरुदत्त वर्ष 1944 से 1964 तक सक्रिय रहे। इस दौरान उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में दीं। कुछ फिल्मों में खुद अभिनय भी किया, जबकि कुछ का केवल निर्देशन किया। उनके करीबी लोग कहते हैं कि गुरुदत्त अपने काम से कभी संतुष्ट नहीं होते थे। उन्होंने कई अच्छी फिल्में बनाईं, काफी मशहूर भी हुए, लेकिन इससे ज्यादा करने की चाहत उनमें हमेशा बनी रही।

गुरुदत्त के बारे में यह बात कम ही लोग जानते हैं कि वह अच्छे डांसर भी थे। उन्होंने प्रभात फिल्म्स में बतौर कोरियोग्राफर अपने फिल्मी जीवन का आगाज किया था। वह लेखक भी थे। उन्होंने कई कहानियां लिखी थीं, जो अंग्रेजी पत्रिका 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया' में छपीं।

गुरुदत्त के पिता का नाम शिवशंकर राव पादुकोण था। मां वसंती पादुकोण की नजर में गुरुदत्त बचपन से ही बहुत नटखट और जिद्दी थे। सवाल पूछते रहना उसका स्वभाव था। कभी-कभी उनके सवालों का जवाब देते-देते मां परेशान हो जाती थीं। उनकी मां ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'वह किसी की बात नहीं मानता था। हमेशा अपने मन की करता था। बहुत गुस्सैल भी था'।

उन्होंने गायिका गीता दत्त से सन् 1953 में विवाह किया। 'प्यासा' और 'कागज के फूल' जैसी क्लासिक फिल्मों के निर्माता गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त कहते हैं कि वह अक्सर चुप और गंभीर रहते थे लेकिन उनका मन हमेशा एक बच्चे जैसा था। वह पतंग उड़ाते, मछली पकड़ते और फोटोग्राफी भी करते थे। गुरुदत्त को खेती करना भी काफी पसंद था।

उनकी पहली फीचर फिल्म 'बाजी' (1951) देवानंद की नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले बनी थी। फिल्म सुररहिट रही। इस फिल्म के दौरान गुरु दत्त की मुलाकात गीता दत्त से हुई। 1953 में दोनों ने शादी कर ली।

इसके बाद दूसरी सफल फिल्म 'जाल' (1952) बनी, जिसमें वही सितारे (देवानंद और गीता बाली) शामिल थे। इसके बाद गुरुदत्त ने 'बाज' (1953) फिल्म के निर्माण के लिए अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरू की। उनकी प्रतिभा का सर्वश्रेष्ठ रूप उत्कट भावुकतापूर्ण फिल्मों में ही प्रदर्शित हुआ।

गहरे चिंतन से भरी उनकी तीन बेहतरीन फिल्में हैं- 'प्यासा' (1957), 'कागज के फूल' (1959) और 'साहब, बीबी और गुलाम' (1962).हालांकि 'साहब, बीबी और गुलाम' का श्रेय उनके सह पटकथा लेखक अबरार अल्वी को दिया जाता है, लेकिन यह मूल रूप में यह गुरुदत्त की कृति थी।

गुरु दत्त के जीवन में गीता के आने के बावजूद उनका दिल वहीदा रहमान पर आ गया। जिस वजह से दोनों में लड़ाईयां होने लगी और दत्त व गीता अलग अलग रहने लगे। गुरू दत्त गीता और वहिदा में इतना कनफ्यूज हो गए कि उन्हें समझ नहीं आया आखिर वो किसे प्यार करते हैं गीता से या वहीदा से।

ऐसा कहा जाता है कि वहीदा रहमान और गुरु दत्त एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे लेकिन गुरु दत्त शादी शुदा थे। वहीदा रहमान को लेकर गुरुदत्त और गीता दत्त में आए दिन झगड़े होते रहते थे। साल 1957 में गुरु दत्त और गीता बाली की शादीशुदा जिंदगी में दरार आ गई और दोनों अलग-अलग रहने लगे।

गुरुदत्त ने 'सीआईडी' में वहीदा रहमान को लिया और हिंदी फिल्म जगत को एक प्रतिभावान अभिनेत्री दी. 'प्यासा' व 'कागज के फूल' जैसी फिल्मों ने वहीदा को कीर्तिस्तंभ की तरह स्थापित कर दिया। गुरुदत्त ने एक बार कहा था, 'देखो न, मुझे निर्देशक बनना था, बन गया। अभिनेता बनना था, बन गया। अच्छी फिल्में बनानी थी, बनाईं। पैसा है, सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा।' कहा जाता है शराब की लत से लंबे समय तक जूझने के बाद 1964 में उन्होंने आत्महत्या कर ली। गुरुदत्त 10 अक्टूबर, 1964 को मुंबई में अपने बिस्तर पर रहस्यमय स्थिति में मृत पाए गए।


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