भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जानें लाइफ के सक्सेस मंत्र (जन्माष्टमी विशेष)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| सितंबर 3 , 2018 , 13:28 IST

(आचार्य कमलनयन तिवारी)

कृष्ण कौन हैं, कृष्ण क्या हैं, उनकी पहचान क्या है, उनके कितने रूप हैं न जाने ऐसे कितने सवाल लोगों के मन में समय समय पर आता रहता है। श्री कृष्ण केवल देवकी नंदन, माखन चोर, लीलाधर ही नहीं हैं बल्कि कृष्ण तो साक्षात भगवान हैं। जो सच्चिदानन्द (शास्वत,ज्ञान तथा आनन्द के) स्वरुप है | उनका कोई आदि नहीं है , क्योकि वे प्रत्येक वस्तु के आदि है | वे समस्त कारणों के कारण है |

ब्रह्म संहिता में कहा भी गया है:

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:।

अनादिरादि  गोविन्द: सर्व कारण कारणम: ।।

यही नहीं  कृष्ण को जगद स्वामी, जगद् गुरु तक कहा गया है। एक श्लोक है जिसके जरिए कृष्ण को समझने की कोशिश की जा सकती है।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्! देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् !! 

वहीं आधुनिकता के हिसाब से देखें तो कृष्ण से बड़ा कोई मैनेजमेंट गुरु नहीं है। कुछ खास प्वाइंट के जरिए इसे समझा जा सकता है।

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कृष्ण विचारों के धनी माने गए हैं। समय के नजाकत को समझना कोई उनसे सीखें, तभी तो असत्य पर सत्य की विजय के लिए अर्जुन के सारथी तक बन गएं।

कृष्ण ने पांडवों, खास कर अर्जुन, और द्रोपदी, इसके अलावा सुदामा का साथ देकर साबित कर दिया कि मुश्किल से मुश्किल में भी वो अपने भक्तों, मित्रों का साथ नहीं छोड़ते हैं।

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यही नहीं कौरवों के पास  विशाल सेना, बड़े से बड़े युद्धवीर होने के बाद भी जीत पांडवों की हुई। क्योंकि मास्टर स्ट्रेटजी तो कृष्ण की थी।

चाहे भीष्म पितामह की हार का कारण जानने के लिए उनके पास द्रोपदी को भेजना हो। द्रोणाचार्य के वद्ध के लिए भीम के जरिए योजना बनाना। यही नहीं जयद्रथ के वद्ध के लिए माया से सूर्य को छिपाना, और तो और कर्ण से अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण बन कर कवच कुंडल दान में ले लेना। 

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यही नहीं महाभारत युद्ध के बाद अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ यानीपरीक्षित की रक्षा। हर बार भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों की पुकार सुनी।  

कृष्ण को सबसे बड़ा कूटनीतज्ञ माना गया है। विरोधियों को शांत करना, उनसे जीतना कोई उनसे जाने। यही नहीं श्री कृष्ण को समझना सबके बस की बात भी नहीं है। क्यों कि कृष्ण तो विचित्र हैं।

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एक बात और  गौर करने वाली है कि, कृष्ण की कोई भी मूर्ति, चित्र हो वो हमेशा टेढ़े ही खड़े मिलेंगे। कृष्ण सबसे सरल हैं, सहज हैं और सुलभ हैं यानी जल्द प्रसन्न होने वालें देव हैं।

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कृष्ण कन्हैया तो केवल एक पत्र, फूल, जल चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

उनको तो केवल भाव से मतलब है, तभी तो महाभारत युद्ध के समय हस्तीनापुर में रात्रि विश्राम के समय वो दुर्योधन के यहां आतिथ्य स्वीकार नहीं किया, बल्कि विदुर के घर जाकर साग रोटी खाई। जो उनके लिए 56 भोग से बढ़कर था।

भगवान श्री कृष्ण ने कहा भी है...

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

यानी जो भी भक्त उके लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है,  वो

निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि प्रेम सहित खाते हैं।

इसलिए श्री कृष्ण के पूजन के लिए कौन सी सामग्री उपलब्ध है, कौन सी नहीं है, किस स्तुति, किस मंत्र का पाठ, जाप करें, सोचे मत। बस निष्काम भाव से उनका पूजन, ध्यान करें। जो उपलब्ध हो वो चढ़ाएं, मुरली वाले भक्तों की सभी मनोकामना जरूर पूरी करेंगे।