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जब से इंसान है तब से वो जिस्मानी रिश्ते भी हैं.. इतिहास के आईने में देखिए समलैंगिकता

दीपक गुप्ता, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 1
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| सितंबर 6 , 2018 , 15:07 IST

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आपसी सहमति से समलैंगिक यौन संबंध बनाए जाने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा कि समलैंगिक समुदाय को भी आम नागरिकों की तरह समान अधिकार हासिल हैं। एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सर्वोच्च मानवता है। समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखना बेतुका है। इसका बचाव नहीं किया जा सकता।

चीफ जस्टिस के अलावा इस बेंच में जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे।

इससे पहले बीते 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिन की सुनवाई के बाद इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था।

नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका:- सेक्‍स वर्कर्स के लिए काम करने वाली संस्‍था नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में यह कहते हुए इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया था कि अगर दो वयस्कों आपसी सहमति से एकांत में सेक्‍सुअल संबंध बनाते हैं तो उसे धारा 377 के प्रावधान से बाहर किया जाना चाहिए। साल 2009 में हाईकोर्ट ने इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला:- साल 2009 में आए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दिसंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने गलत करार दिया और धारा 377 को अपराध की श्रेणी में रखा।

LGBT समुदाय ने की 377 हटाने की थी मांग:- LGBTQ समुदाय के तहत लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंटर और क्वीयर आते हैं। एक अर्से से इस समुदाय की मांग है कि उन्हें उनका हक दिया जाए और धारा 377 को अवैध ठहराया जाए। निजता का अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस समुदाय ने अपनी मांगों को फिर से तेज कर दिया था। इसी के तहत एक साथ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित थीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है।

क्या है धारा 377 ?:- साल 1861 में धारा 377 में अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध के तौर परिभाषित किया गया है। इस धारा के मुताबिक जो कोई भी प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ यौनाचार करता है, उसे उम्रकैद या दस साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है। धारा 377 के मुताबिक कोई किसी पुरुष, स्त्री या पशुओं से प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध संबंध बनाता है तो यह अपराध होगा। इस अपराध के लिए उसे उम्रकैद या 10 साल तक की कैद के साथ आर्थिक दंड का भागी होना पड़ेगा। सीधे शब्दों में कहें तो धारा-377 के मुताबिक अगर दो अडल्ट आपसी सहमति से भी समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो वह अपराध होगा।

अप्राकृतिक यौन संबंध पर कानून का इतिहास:- साल 1290 में सबसे पहले इंग्लैंड के फ्लेटा इलाके में अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का मामला सामने आया था, जिसे कानून बनाकर अपराध की श्रेणी में रखा गया। यह इस तरह का पहला मामला था। इसके बाद ब्रिटेन और इंग्लैंड में 1533 में अप्राकृतिक संबंधों को लेकर बगरी एक्ट बनाया गया। जिसके तहत फांसी का प्रावधान था। 1563 में क्वीन एलिजाबेथ-प्रथम ने इसे फिर से लागू कराया। 1817 में बगरी एक्ट से ओरल सेक्स को हटा दिया गया।

इन देशों में अपराध नहीं समलैंगिक यौन संबंध:- ऑस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड, लक्जमबर्ग, इंग्लैंड और वेल्स, ब्राजील, फ्रांस, न्यूजीलैंड, उरुग्वे, डेनमार्क, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे 26 देशों ने समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। इन देशों में इस तरह के यौन संबंध मान्य हैं। अब भारत भी इन देशों में शामिल हो गया है।


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