ख़ास रिपोर्ट

आयरलैंड का एक गोरा जिसके दम पर जाट रेजिमेंट ने जीती कठिन जंग और शास्त्री ने कहा ‘जय जवान, जय किसान’

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| सितंबर 18 , 2017 , 20:30 IST

हमारा देश जब आज़ाद हुआ तो तमाम ब्रिटिश फौजी अफसरों की तरह आयरिश मूल के इस नौजवान अफसर के सामने भी दो विकल्प थे। पहला, वापस अपने देश चला जाए। दूसरा, वो चाहे तो हिंदुस्तान या पाकिस्तान की फौज के साथ ही बना रहे। लगभग सभी ब्रिटिश फौजियों ने पहला विकल्प ही चुना लेकिन इस नौजवान अफसर ने भारत में अपनी रेजिमेंट के साथ रहने का फैसला किया। 

इसके बाद की तो एक अतुल्य कहानी है। इस अफसर ने रेजिमेंट के साथ हिंदुस्तान के लिए जंग लड़ी, रिटायरमेंट के बाद भी इस अफसर के लिए रेजिमेंट ही सब कुछ थी और इंसानी दुनिया छोड़ने के बावजूद वो आज भी अपनी रेजिमेंट के साथ ही है।

ये अफसर थे डेसमंड हायड। यूनाइटेड किंगडम में आयरलैंड के एक्सेटर में 28 नवम्बर 1926 को जन्मे डेसमंड हायड ने 12 सितम्बर 1948 को भारतीय फौज की जाट रेजिमेंट के साथ कमीशन हासिल किया। इनकी अगुवाई में जाट रेजिमेंट के कुछ सैनिकों ने 50 साल पहले एक ऐसी जंग लड़ी जिसे दुनिया की सबसे कठिन जंगों में से एक माना जाता है।

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जंग

1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल हायड जाट रेजिमेंट की तीसरी बटालियन या 3 जाट के कमांडिंग ऑफिसर बने। बटालियन की कमान सम्भालने के कुछ घंटों के भीतर ही उन्हें पाकिस्तान में बहने वाली इछोगिल नहर को भेदने का आदेश मिला। इस नहर के दूसरी तरफ पाकिस्तानी फौज ने कंक्रीट के बंकर बना रखे थे, जहां उनके बख्तरबंद दस्ते भी तैनात थे। लेकिन हायड की बटालियन ने इस नहर को भेद डाला। इसके बाद उन्हें लाहौर और ग्रांड ट्रंक रोड से लगते कस्बे ‘डोगराई’ पर धावा बोलने का आदेश मिला।

3 जाट ने 6 और 7 सितम्बर 1965 की रात को पहली बार डोगराई पर धावा बोला। लेकिन, पीछे हटना पड़ा क्योंकि उनकी मदद के लिए जिस यूनिट को आना था वो संवादहीनता के चलते पहुंच ही नहीं पाई। लेकिन, लेफ्टिनेंट कर्नल हायड अपने जवानों के साथ मजबूती से मैदान में डटे रहे जब तक कि ब्रिगेड मुख्यालय से उन्हें पीछे हट जाने का आदेश नहीं मिला। यहां साफ करना जरूरी है कि जाट रेजिमेंट कहीं भी अपने मिशन में असफल नहीं हुई थी, लेकिन ऊपर के आदेशों के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा। हालांकि सेना की इस गफलत के चलते एक मेजर जनरल को अपने पद से हाथ धोना पड़ा। उधर 3 जाट को अगले आदेश तक 15 दिन दुश्मन से महज 8 किलोमीटर दूर पाकिस्तान के ही सन्तपुरा गांव की खाइयों में बिताने पड़े। इतने दिनों में पाकिस्तानी फौज ने डोगराई में जबरदस्त किलेबंदी कर दी।

इन विषम हालातों के बीच कर्नल हायड को 21 सितम्बर की रात को फिर डोगराई पर धावा बोलने का आदेश मिला। डोगराई पर धावा बोलने से पहले हायड ने दो बातें अपने जवानों से साफ तौर पर कह दी थीं, वो भी ठेठ हरियाणवी में। पहली, एक भी आदमी पीछे नहीं हटेगा और दूसरी, जिंदा या मुर्दा, डोगराई में मिलना है।

इसी का नतीजा था कि 3 जाट बटालियन अपने सर्वोच्च आत्मबल के साथ जंग के मैदान में उतरी। रात को करीब 1.30 बजे सूबेदार पाले राम के “जाट बलवान, जय भगवान” के नारे साथ ही रेजिमेंट के 523 बहादुर सैनिकों ने कूच करना शुरू किया। सामने खुद से दोगुनी से ज्यादा संख्या वाली फौज थी। डोगराई में पाकिस्तानी फौज की इन्फेंट्री (3 बलोच) की 2 बटालियनों ने मोर्चा संभाल रखा था जिन्हें एक टैंक स्क्वाड्रन की भी मदद मिल रही थी।

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गोलियों की बौछारों के बीच 3 जाट के जवान डोगराई तक 8 किलोमीटर छिपते हुए, रेंगते हुए जैसे तैसे आगे बढ़े। वो भी उन खाइयों में जिन्हें पाकिस्तानी फौज ने खुद अपने लिए बनाया था। साफ है हायड के सैनिकों के लिए डगर बेहद कठिन थी। इन हालातों के बीच हायड ने अपने आदमियों से दो टूक कह दिया कि, “यहां तक कि तुम सभी भाग जाओ, लेकिन मैं अकेला ही युद्ध के मैदान में डटा रहूंगा।” दूसरी तरफ जवानों ने भी अपनी रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास का हवाला देते हुए किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटने का भरोसा दिया।

हायड के जवान बन्दूकों, संगीनों, ग्रेनेड से, यहां तक कि निहत्थे लड़ते रहे, इंच दर इंच आगे बढ़ते रहे। एक-एक कर हर रास्ते, गली, घर, बंकर पर कब्जा किया. कुछ ही घंटों में पाकिस्तानियों ने भागना शुरू कर दिया। सुबह 4 बजे तक या तो पाकिस्तानी सैनिक मारे जा चुके थे, या फिर भारतीयों के कब्जे में थे और बाकी जंग के मैदान से भाग चुके थे। दिन निकलने के साथ ही लांस नायक ओमप्रकाश ने शान के साथ डोगराई में तिरंगा फहरा दिया, वो भी लाहौर के बिल्कुल दरवाजे पर। 22 और 23 सितम्बर को भी कुल मिलाकर चार बार पाकिस्तान की तरफ से हमले हुए लेकिन उन्हें फिर मुंह की खानी पड़ी। उल्टा 3 जाट ने डोगराई से लगते बाटापुर और अत्तोकअवान पर भी कब्ज़ा कर लिया।

हां, इस जंग की इस रात में हायड ने अपने 86 बहादुर जवान (5 अफसर, 1 JCO और 80 अन्य सैनिक) तो खोए लेकिन बदले में दोगुने से ज्यादा दुश्मन सैनिक ढेर कर दिए। हां, जंग की इस रात ने 3 जाट को तीन महावीर चक्र, चार वीर चक्र और सात सेना मेडल जरूर दिला दिए जो किसी भी बटालियन के लिए असम्भव सी बात है। (हां, युद्धविराम के बाद 5 दिन बाद 3 जाट और 3 बलोच के सैनिक नहर किनारे फिर मिले, लेकिन इस बार उन्होंने खूब बीयर्स पी और युद्ध से जुड़ी खूब बातें कीं।)

सम्मान

डेसमंड हायड को युद्धकालीन सेवाओं में दिए जाने वाले दूसरे सबसे बड़े सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। हायड अकेले ऐसे सैनिक हैं जिनका मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन ने पोट्रेट बनाया और वो भी जंग के मैदान डोगराई में जाकर। आज यही पोट्रेट बरेली में जाट रेजिमेंटल सेंटर के म्यूजियम में एक खास जगह रखता है और रेजिमेंट को गर्व का अहसास करवाता रहता है। हायड की बटालियन को एक और विशिष्ट गौरव हासिल हुआ जब 29 अक्टूबर 1965 के दिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री खुद डोगराई पहुंचे और हायड के बहादुर सैनिकों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने भारत में अब तक का सबसे मशहूर नारा, “जय जवान, जय किसान” दिया।

सेना के कई अफसर डोगराई को अब तक की सबसे कठिन जंग बताते हैं। जाट रेजिमेंट के लिए सबसे हौसलावर्धक तारीफ पाकिस्तानी सेना के सूबेदार मेजर इस्लामुद्दीन की तरफ से आई, उनके मुताबिक, “ऐसा सिर्फ मेरी पुरानी बटालियन ही कर सकती थी”। इसके बाद हायड ने 1971 की जंग में भी हिस्सा लिया जब उन्होंने जम्मू सेक्टर में पूरी एक ब्रिगेड की कमान संभाली।

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रिटायरमेंट

30 शानदार साल सेना की जाट रेजिमेंट के साथ गुजारने के बाद हायड 1978 में ब्रिगेडियर के पद से रिटायर हुए। लोग बताते हैं कि हायड सेना प्रमुख तक भी पहुंच सकते थे लेकिन मिजाज (साफगोई) के चलते वो शायद इस रेस में पिछड़ गए। रिटायरमेंट के बाद हायड अपनी पत्नी के शहर कोटद्वार चले गए और बरेली से साथ ले गए एम एफ हुसैन की बनाई हुई उनकी पेंटिंग, कुछ मेडल्स और एक टाइपराइटर जिसके जरिए वे ताउम्र फौजियों के कल्याण के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सेना प्रमुख तक को लगातार खत लिखते रहे। कोटद्वार में उन्होंने एक स्कूल खोला, एक एक्स-सर्विसमैन लीग का गठन किया। हां, बहुत सारे आवारा कुत्तों को भी आसरा दिया। हायड अपनी जाट रेजिमेंट से बेपनाह मोहब्बत करते थे और इसी का नतीजा था कि हायड की हरियाणवी उनकी टूटी फूटी हिंदी से कहीं बेहतर थी।

मजबूत शख्सियत के धनी हायड की जिंदगी बड़ी सरल थी और उनके जीवन का सीधा-सा मूलमंत्र था कि, “आपका देश सबसे पहले है, उसके बाद दूसरे नंबर पर आपके जवान आते हैं और सबसे आखिर में आपके खुद के हित आते हैं।” यानि उनकी जिन्दगी के उसूल बड़े साफ थे। जिनकी जिन्दगी का हरेक दिन भारतीय फौज को समर्पित था।

मृत्यु

कहते हैं कि अपनी मौत से ठीक एक महीने पहले हायड ने कैलेंडर में 25 सितम्बर की तारीख पर गोला किया और कहा कि यह उनकी जिंदगी का आखिरी दिन होगा। उनके साथियों ने ब्रिगेडियर हायड से कहा कि आप क्या मजाक कर रहे हैं? लेकिन ऐसा ही हुआ ठीक 25 सितम्बर 2013 के दिन हुआ हायड ने 87 साल की उम्र में यह दुनिया छोड़ दी। लेकिन अपनी रेजिमेंट को नहीं छोड़ा।

हायड को कोटद्वार से लाकर उसी जाट रेजिमेंट के मुख्यालय (रेजिमेंटल सेंटर) बरेली में ही दफनाया गया जिससे वे बेपनाह मोहब्बत करते थे। रेजिमेंट ने भी अपने सबसे प्रिय, सम्मानित अफसर को पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। साफ है ब्रिगेडियर हायड कोई साधारण सैनिक नहीं थे, उनकी जैसी असाधारण वीरता के नमूने बिरले ही मिलते हैं। हां, रेजिमेंट में आज भी हायड की पूजा की जाती है।


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