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इंदिरा गांधी के 7 बड़े फैसले से बदला भारत का इतिहास, विरोध के बाद भी बनीं पीएम

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| नवंबर 19 , 2018 , 11:09 IST

इंदिरा गांदी की फौलादी इरादों ने देश के इतिहास को बदल कर रख दिया। 'आयरन लेडी ऑफ इंडिया' इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर, 1917 को जवाहरलाल नेहरू के घर में हुआ। इंदिरा का नाम उसके दादा मोतीलाल नेहरू ने दिया।

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फौलादी हौंसले वाली इंदिरा गांधी ने लगातार तीन बार और कुल चार बार देश की बागडोर संभाली और वह देश की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रहीं। उनके कुछ फैसलों को लेकर वह विवादों में भी रहीं। जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई भी उनका एक ऐसा ही कदम था, जिसकी कीमत उन्हें अपने सिख अंगरक्षकों के हाथों जान गंवाकर चुकानी पड़ी।

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कई ऐसे फैसले थे जिसे इंदिरा ने लेकर देश के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरो में दर्ज कर ली। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी किताब बियांड द लाइंसः एन आटोबायोग्राफी में लिखते हैं, लालबहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु से फिर प्रधानमंत्री के चयन की जिम्मेदारी कांग्रेस अध्यक्ष कामराज के कंधों पर आ पड़ी। इसी उद्देश्य से वह एक चार्टेड विमान से दिल्ली पहुंचे। उनके साथ दुभाषिए के रूप में आर वेंकटरमन भी थे, जो मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दिनों से उनके साथ जुड़े हुए थे।

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विमान के उड़ान भरते ही कामराज सो गए। दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरने से पंद्रह मिनट पहले ही उनकी आंख खुली तो वो बोले, इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री होंगी। मानों उन्होंने सोते समय इस प्रश्न को सुलझा लिया हो। जब वेंकटरमन ने उनसे जानना चाहा कि वो फैसले पर कैसे पहुंचे तो उन्होंने कहा, सिर्फ गुलजारी लाल नंदा और इंदिरा गांधी में से किसी एक को चुनने की बात थी।
कांग्रेस के ज्यादातर नेता नन्दा के पक्ष में थे। सभी ने कामराज को सुझाव दिया था कि इंदिरा पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इसके बावजूद कामराज ने इंदिरा को ही चुना. जवाहर लाल नेहरू के विशेष सचिव एमओ मथाई अपनी किताब में लिखते हैं कि कामराज को लगा था कि वो एक गुड़िया को चुन रहे हैं, जो उन लोगों के मनमुताबिक चलेगी। लेकिन बाद में जब इंदिरा ने सरकार और पार्टी दोनों पर पकड़ बनानी शुरू कर दी तो कामकाज ने एक दिन मथाई से कहीं मिलने पर झुंझला कर कहा, मैने तो उसे मूक गुड़िया समझा था लेकिन वो कुछ ज्यादा ही आगे जा रही है।

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जब कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेताओं ने सिंडिकेट ने इंदिरा पर शिकंजा कसना चाहा तो उन्होंने 1969 में पार्टी ही तोड़ दी। 1971 में देश की जनता ने इंदिरा की कांग्रेस को बहुमत से जिताया। बस उसके साथ ही पुराने दिग्गजों की कांग्रेस हाशिए पर चली गई।

इंदिरा के युग की शुरुआत हो चुकी थी। उन्होंने राजाओं का प्रिविपर्स बंद किया। प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके देश में वाहवाही लूट ली। और भी कई ऐसे कदम उठाए, जिससे आम जनता में लगने लगा कि उनमें वाकई दम है। रही सही कसर उन्होंने 1971 में बांग्लादेश को अलग देश बनाकर कर दी। इसके बाद तो वो वाकई देश में दुर्गा और लौहमहिला बन गईं। कुछ फौलादी फैसले ने देश की इतिहास को पलटकर रख दिया, उसमें से...

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बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969)

19 जुलाई, 1969 को इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया। यह अध्यादेश देश के 14 निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए था। इन 14 बैंकों में देश का करीब 70 फीसदी जमा था। अध्यादेश पारित होने के बाद इन बैंकों का मालिकाना हक सरकार के पास चला गया। ऐसा आर्थिक समानता को बढ़ावा देने के लिए किया गया। इस अध्यादेश को बैंकिंग कंपनी (उपक्रमों का अधिग्रहण एवं स्थानांतरण) था। उसके बाद इसी नाम से एक कानून आया।

पाकिस्तान के दो टुकड़े (1971)

इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को ऐसा जख्म दिया है जिसकी टीस हमेशा उसको महसूस होती रहेगी। पाकिस्तान के लिए यह जख्म 1971 के बांग्लादेश युद्ध के रूप में था जिसके बाद पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए। पाकिस्तान के सैन्य शासन ने पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर जुल्म की इंतहा कर दी थी। उसके नतीजे में करीब 1 करोड़ शरणार्थी भागकर भारत में चले आए थे। बाद में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ जिसमें न सिर्फ पाकिस्तान की शर्मनाक हार हुई बल्कि उसके 90,000 सैनिकों को भारत ने युद्धबंदी बनाया था।

आपातकाल (1975-77)

इंदिरा गांधी के संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। उस याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया था। छह सालों तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी। उनको संसद से भी इस्तीफा देने को कहा गया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने हाई कोर्ट का फैसला मानने से इनकार कर दिया। उसके बाद देश भर में विरोध-प्रदर्शन होने लगे और उनसे इस्तीफा की मांग की जाने लगी। इस सबको देखते हुए इंदिरा गांधी ने 25 जून, 1975 को आपातकाल लगा दिया और बड़ी संख्या में विरोधियों के गिरफ्तारी का आदेश दिया। भारतीय लोकतंत्र में इस दिन को 'काला दिन' कहा जाता है। आपातकाल करीब 19 महीने तक रहा।

ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984)

जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके सैनिक भारत का बंटवारा करवाना चाहते थे। उनलोगों की मांग थी कि पंजाबियों के लिए अलग देश 'खालिस्तान' बनाया जाए। भिंडरावाले के साथी गोल्डन टेंपल में छिपे हुए थे। उन आतंकियों को मार गिराने के लिए भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन ब्लूस्टार' चलाए थे। इस ऑपरेशन में भिंडरावाले और उसके साथियों को मार गिराया गया। साथ ही कुछ आम नागरिक भी मारे गए थे। बाद में इसी ऑपरेशन ब्लूस्टार का बदला लेने के मकसद से इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी।

ऑपरेशन मेघदूत

1984 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत को अंजाम दिया था और पाकिस्तान की कब्र खोदी थी। इस ऑपरेशन की मंजूरी इंदिरा गांधी ने ही दी थी। दरअसल पाकिस्तान ने 17 अप्रैल, 1984 को सियाचिन पर कब्जा करने की योजना बनाई थी जिसकी जानकारी भारत को लग गई। भारत ने उससे पहले सियाचिन पर कब्जा करने की योजना बनाई और इस ऑपरेशन का कोड नाम 'ऑपरेशन मेघदूत' था।

1974 में पोखरण में परमाणु परीक्षण

18 मई, 1974 भारतीय इतिहास का अहम दिन था। इसी दिन भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण करके दुनिया को हैरत में डाल दिया था। इस ऑपरेशन का नाम स्माइलिंग बुद्धा था।

प्रिवी पर्स यानी राजभत्ते को खत्म करना

आजादी के बाद भारत में अपनी रियासतों का विलय करने वाले राजपरिवारों को एक निश्चित रकम देने की शुरुआत की गई थी। इस राशि को राजभत्ता या प्रिवी पर्स कहा जाता था। इंदिरा गांधी ने साल 1971 में संविधान में संशोधन करके राजभत्ते की इस प्रथा को खत्म किया। उन्होंने इसे सरकारी धन की बर्बादी बताया था।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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