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आखिर क्यों बॉलीवुड में फिरोज खान को 'लेडी किलर' कहा जाता था (जयन्ती विशेष)

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| सितंबर 25 , 2017 , 12:00 IST

कुर्बानी और जाँबाज जैसी फिल्मों के जरिये जिंदादिल और रूमानी हीरो के रूप में पहचान बनाने वाले बॉलीवुड अभिनेता फिरोज खान की सोमवार को जयन्ती है। फिरोज खान का जन्म 25 सितंबर 1939 को अफगानिस्तान से विस्थापित होकर आए एक पठान परिवार में हुआ था। उनके पिता सादिक खान अफगानी और उनकी माता फातमा ईरानी थी।

अभिनेता के रूप में भी फिरोज खान ने बॉलीवुड के नायक की परम्परागत छवि के विपरीत अपनी एक विशेष शैली गढ़ी, जो आकर्षक और तडक-भडक़ वाली छवि थी। उनकी अकडकर चलने की अदा और काउब्वाय वाली इमेज दर्शकों के मन में आज भी बसी हुई है। वह पूर्व के क्लाइंट ईस्टवुड कहे जाते थे और फिल्म उद्योग के स्टाइल आइकान माने जाते थे।

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फिल्मी दुनिया में कदम रखते समय 18 साल के फिरोज खान को एक विदेशी लड़की से प्यार हो गया, लड़की शादी करना चाहती थी, लेकिन फिरोज खान करियर बनाने की धुन में थे इसलिए पहला प्यार परवान नहीं चढ़ सका। जुदाई का दर्द अपनी जगह था और हीरो बनने की जद्दोजहद अपनी जगह। फिरोज खान को फिल्में तो मिल रही थीं, लेकिन मुख्य किरदार न मिल पाने से उनकी पहचान नहीं बन पा रही थी। शुरुआती दौर में उन्हें कम बजट वाली थ्रिलर फिल्में ही मिलीं। जैसे ‘रिपोर्टर राजू’, ‘सैमसन’, ‘चार दरवेश’, ‘एक सपेरा एक लुटेरा’, ‘सीआईडी 999’,। अपनी पहचान बनाने के लिए फिरोज को आठ साल लंबा इंतजार करना पड़ा। 1965 में आई फ़िल्म ‘ऊंचे लोग’ की कामयाबी ने फिरोज खान को मजबूती से स्थापित कर दिया।

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अपनी पहली उल्लेखनीय फिल्म ‘ऊंचे लोग’ 1965 के बाद उसी साल सहायक अभिनेता के रूप में उनकी ब्लाक बस्टर फिल्म ‘आरजू’ आई। इस फिल्म ने फिरोज खान के लिए बड़े बजट और बड़े निर्देशकों की फिल्मों के द्वार खोल दिए। ‘आदमी और इंसान’ (1969) और ‘सफर’(1970) ने फिरोज खान को भारी लोकप्रियता दिलाई। ‘आदमी और इंसान’ के लिए तो उन्हें श्रेष्ठ सह अभिनेता का फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला, लेकिन इसके बाद फिरोज खान को उनकी मेहनत का सिला किसी बड़े पुरस्कार के रूप में कभी नहीं मिला। फिर उनके अभिनय जीवन के 42 साल बाद बुढ़ापे में उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला।

कमीज के ऊपर के दो बटन खुले हुए और टाइट फिटिंग की पैंट, होठों में या फिर हाथ में लापरवाही से पकड़ी हुई सिगरेट, यह फिरोज का अपना स्टाइल था जो उनकी फिल्मों में बार-बार नजर आता है। निजी जीवन में भी फिरोज खान अपनी कपड़ों की खासियत और स्टाइल की वजह से पहचाने जाते रहे हैं। मुख्य किरदार का रोल पान के लिए संघर्ष करते फिरोज खान को महसूस होने लगा था कि उन्हें फिल्म निर्देशन की बारीकियां सीख लेनी चाहिए, क्योंकि अपनी डायरेक्ट की हुई फिल्म में ही उन्हें वह सब करने का मौका मिल सकेगा जो वह चाहते हैं।

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वह चाहते थे हॉलीवुडनुमा फिल्में और फिल्म ‘अपराध’ (1972 ) के प्रोड्यूसर डायरेक्टर बनकर फिरोज ने अपने फैसले को सही साबित कर दिया। एक्शन, कार रेस, दुस्साहसी स्टंट, बंदूक और हिंसा फिरोज खान के पसंदीदा फिल्मी विषय रहे। उनकी अधिकतर फिल्मों उनका नाम राजेश या फिर राकेश हुआ करता था।

‘अपराध’ के बाद फिरोज खान ने ‘कशकमश’ और ‘गीता मेरा नाम’ में काम किया उनके काम की सराहना भी हुई, लेकिन उन्हें उनकी पसंद का रोल मिला फिल्म ‘खोटे सिक्के’ में। एक्शन से भरपूर इस फिल्म में फिरोज ने रॉबिनहुड नुमा किरदार निभाया। फिल्म खासी हिट रही। इससे पहले फिरोज ने 1962 में एक भारतीय अंग्रेजी फिल्म "टार्जन गोज टू इंडिया" में काम किया था, जिसमें उनकी हिरोइन थीं सिम्मी ग्रेवाल लेकिन फिल्म को रिलीज होने में 12 साल लग गए और यह फिल्म 1974 में रिलीज हुई और बुरी तरह असफल रही।

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इसके बाद ‘अंजान राहें’, ‘काला सोना’, ‘इंटरनेशनल क्रुक’ और ‘आजा सनम’ जैसी फिल्मों में फिरोज नजर आए, लेकिन खोटे सिक्के के बाद उन्हें मिली काला सोना से। फिरोज दूसरे बैनर की फिल्में कर रहे थे, लेकिन उनके दिमाग में अपनी एक फिल्म की कहानी घूम रही थी और 1975 में उनके निर्देशन में ‘धर्मात्मा’ आई। अपनी पहली बनायी फ़िल्म ‘अपराध’ में जहां फिरोज फॉर्मूला कार रेस शूट करने जर्मनी गए वहीं धर्मात्मा की पूरी शूटिंग अफगानिस्तान में हुई और इसमें वहां के परंपरागत घुड़सवारी के खतरनाक खेल बुजकशी को दिखाया गया जो भारतीय दर्शकों के लिए नया और पहला अनुभव था।

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फिरोज खान अपनी बनायी फिल्मों में हिरोइन के सौंदर्य और सेक्स अपील को अपने खास नजरिए से पेश करने के लिए भी याद किए जाते हैं। धर्मात्मा स्वप्न सुंदरी हेमा मालिनी की उन चुनी हुई फिल्मों में है, जिसमें उनकी बेपनाह खूबसूरती को बेहद सधे हुए ढंग से प्रदर्शित किया गया है। ‘जांबाज’ में अनिल कपूर और डिंपल कपाड़िया का प्रणय दृश्य भारतीय सिनेमा के यादगार प्रणय दृश्यों में से एक माना जाता है। फिरोज ने ‘दयावान’ में माधुरी दीक्षित और विनोद खन्ना का लगभग दो मिनट लंबा चुंबन दृश्य दिखा कर दर्शकों के बीच हंगामा खड़ा कर दिया था। इतना लंबा चुंबन दृश्य इससे पहले भरातीय सिनेमा के इतिहास में कभी नहीं दिखाया गया था। और ‘क़ुर्बानी’ में भीगी साड़ी में ज़ीनत का सौंदर्य कभी न भुला पाने वाला दृश्य बन पड़ा है। फिरोज खान के जीवन की सबसे बड़ी हिट फिल्म थी ‘क़ुर्बानी’।

1980 में प्रदर्शित इस फिल्म का बजट दो करोड़ रूपए था। फिल्म को पूरा करने के लिए फिरोज खान को अपने रेस के घोड़े बेचने पड़े और साथ ही रेस पर दांव लगाने का अपना शौक भी उन्हें बंद करना पड़ा। इस फिल्म में बिद्दू के संगीत ने नौजवानों में तहलका मचा दिया खास कर पाकिस्तानी मूल की गायिका नाजिया हसन के गाए गीत ‘आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए’ ने तो अपनी तरह के गानों का ट्रेंड शुरू कर दिया।

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कुर्बानी की कामियाबी के बाद अगले चार साल में फिरोज खान की अभीनीत सिर्फ दो फिल्में ‘कच्चे हीरे’ और ‘खून और पानी’ रिलीज हुईं जिनकी कोई चर्चा नहीं हुई फिर 1985 में फिरोज खान की निर्देशित और अभीनीत फिल्म ‘जांबाज’ आई। इसके बाद उन्होंने ‘यलगार’ शुरू की, लेकिन अचानक उन्हें तमिल फिल्म ‘नायकन’ देखने का मौका मिला और ‘यलगार’ छोड़ उन्होंने ‘दयावान’ के नाम से नायकन का रीमेक बना डाला। इसके बाद उन्हें ‘यलगार’ बनाने में दो साल और लग गए। इसके बाद फिरोज खान को अगली फिल्म बनाने में दस साल का अर्सा लगा। हांलाकि बीच में उन्होंने रीना राय के साथ गुल ए बकावली में काम किया, लेकिन यह फिल्म कभी प्रदर्शित नहीं हो सकी।

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इस दौरान उनसे जब भी अगली फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने यही जवाब दिया कि उन्हें अच्छी कहानी नहीं मिल रही है और फिरोज खान बैंगलोर के अपने फॉर्म हाउस पर शाहाना जीवन जीते रहे। शायद इसके बाद वो फिल्मों से अलग हो गए होते, लेकिन अपने बेटे फरदीन खान को लॉन्च करने के लिए उन्होंने फिल्म ‘प्रेम अगन’ (1998) बनायी पर यह जल्दबाजी का फैसला था क्योंकि एक अच्छी कहानी की फिरोज की तलाश पूरी नहीं हो पाई और ‘प्रेम अगन’ बुरी तरह फ्लॉप हुई। यह उनकी बनायी पहली ऐसी फ़िल्म थी जिसमें उन्होंने अभिनय नहीं किया।

एक बार फिर उन्होंने फरदीन के करियर को सहारा देने के लिए फिल्म ‘जानशीन’ (2003) बनायी। पिछली फिल्मों में कार और घोड़ों के करतब दिखा चुके फिरोज खान इस बार ऑस्ट्रेलिया पहुंचे और वर्ड मोबाइक रेस को फिल्माया, लेकिन उनकी कोई भी कोशिश कामियाब नहीं हो सकी यह फिल्म भी बुरी तरह फ्लॉप हुई। फिरोज की अंतिम दो फ़िल्में ‘एक खिलाड़ी एक हसीना’ (2005) और ‘वेलकम’ (2007) रहीं। वेलकम में उनका कॉमिक रोल था वे दुबई के डॉन आरडीएक्स बने। उनके प्रशंसकों के लिये आरडीएक्स को देखना सुखद एहसास था।

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साईं बाबा की तस्वीर को अपनी अंगूठी में पहनने वाले फिरोज खान रिश्ते निभाने में यकीन रखते थे उन्होंने अपनी कई फिल्मों की हिरोईन और गहरी दोस्त मुम्ताज की बेटी से अपने बेटे फरदीन की शादी की। अपने बच्चों को उन्होंने अपनी तरह ही आजाद ख्याल बनाया जब उनकी बेटी लैला ने भारतीय टेनिस खिलाड़ी रोहित राजपाल से अपने प्यार और शादी करने के फैसले से घरवालों को अवगत कराया तो फिरोज ने कोई आपत्ति जाहिर नहीं की और धूमधाम से लैला की शादी रोहित से हुई।

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फिल्म ‘वेलकम’ में फिरोज ने आरडीएक्स का कॉमिक रोल जरूर निभाया, लेकिन वो अपनी सुपरहिट फिल्म ‘कुर्बानी’ के रीमेक की तैयारी कर रहे थे। इसमें उनकी भूमिका फरदीन और विनोद खन्ना वाली भूमिका सैफ को अदा करनी थी, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और 27 अप्रैल 2009 को हिंदी फिल्मों का अपने समय का सबसे स्टाइलिश फिल्मकार मौत की आगोश में सो गया।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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