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प्रणब दा ने बताया ''भारत" का मतलब क्या ?

icon कल्याण कुमार | 1
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| जून 7 , 2018 , 22:18 IST

नागपुर में हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के जाने का विरोध कर रहे कांग्रेस नेताओं को अब गर्व होना चाहिए कि उन्होंने राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति जैसे शब्दों की उस तरह व्याख्या की, जिसके सपने संविधान निर्माताओं ने देखे थे। प्रणब दा जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर बढ़ती हिंसा से चिंतित दिखे और बहुलवाद को भारतीय राष्ट्रीयता की आत्मा करार दिया। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि परस्पर सौहार्द, भाईचारा, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, सम्मान, न्याय, स्वतंत्रता एवं समानता के सिद्धांतों पर चलकर ही हम भारत को आगे ले जा सकते हैं।

50 साल से अधिक समय तक देश की राजनीति में सक्रिय रहे प्रणब मुखर्जी ने बिलकुल ही सधे अंदाज में कहा कि देशभक्ति में देश के सभी लोगों का योगदान है।  देशभक्ति का मतलब है देश के प्रति आस्था। भारतीय राष्ट्रवाद में वैश्विक भावना समाहित है और विविधता ही हमारी ताकत है। सहिष्णुता हम भारतवासियों की सबसे बड़ी पहचान है। 1600 वर्ष पूर्व के जनपद युग से लेकर मौर्य वंश, गुप्त वंश, मुस्लिम शासन, ब्रिटिश शासन तक के पड़ावों का जिक्र करते हुए प्रणब मुखर्जी ने समझाया कि तमाम शासकों के बदलने के बावजूद हमारी संस्कृति अक्षुण्ण रही, हमारा सामाजिक ताना-बाना और राष्ट्रीय चरित्र नहीं बदला, यही भारतीयता है। पूर्व राष्ट्रपति एवं महान दार्शनिक डॉ. राधाकृष्णन, जाने-माने इतिहासकार विल्सन स्मिथ, नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर, आजादी के अग्रणी योद्धा एसएन बनर्जी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान का जिक्र करते हुए प्रणब दा ने दो टूक कहा कि 122 भाषाओं, 1600 बोलियों, 7 बड़े धर्मों और 3 बड़े नस्लों वाले देश भारत में एक सिस्टम, एक झंडा और एक संविधान से शासन चल रहा है, जो हमारे लिए गर्व की बात है, यही हमारी एकता है, हमारी ताकत है। इसी संवैधानिक देशभक्ति के माध्यम से हम अपने देश को मजबूत बना सकते हैं। 1800 साल तक पूरी दुनिया के लिए शिक्षा के केंद्र रहे भारत की पहचान को भेदभाव और नफरत से खतरा है। वास्तव में नागरिकों के सम्मान में ही राष्ट्र की एकता का भाव छिपा है। इसलिए सभी भारतीयों को शांति, सौहार्द्र और जन-जन की खुशहाली की प्रार्थना करनी चाहिए।

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प्रणब दा को संघ के कार्यक्रम में जाने से रोकने के लिए कांग्रेस के कई नेताओं ने कोशिश की। उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी पिता से नाराजगी जताई लेकिन पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम् की सलाह शायद दादा को अच्छी लगी और वे उसी के अनुरूप संघ कार्यकर्ताओं को नसीहत देकर आए। चिदंबरम् ने कहा था, 'सर आपने निमंत्रण स्वीकार किया हैकृपया वहां जाएं और उन्हें बताएं कि वे वैचारिक दृष्टिकोण से कहां गलत हैं...'

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का यह भाषण ऐतिहासिक है। इस भाषण का प्रत्येक शब्द और वाक्य संग्रहणीय है। वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखीन, सर्वे सन्तु निरामयः का उल्लेख कर दादा ने संघ और देशवासियों को साफ संदेश दे दिया कि भारत की असली ताकत क्या है...सरकार और समाज संकल्प के साथ उनके बताए मार्ग पर चले तो वह दिन दूर नहीं जब खुशहाली के अंतरराष्ट्रीय ग्राफ में भारत का स्थान कहीं ऊपर होगा...।