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मंजू वर्मा तो गईं, अब बेसहारा बेटियों के बारे में सोचिये सरकार

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| अगस्त 11 , 2018 , 14:03 IST

मुझे लंबे समय तक यह दुःख सालता रहा कि मैं सरकारी मुलाज़िम नहीं बन पाया लेकिन मुज़फ्फ़रपुर कांड के बाद सुकून में हूं कि मैं उस व्यवस्था का हिस्सा नहीं बना, जिसके अट्टाहास में अनाथ-मासूम बेटियों की चित्कार दब जाती है। मुझे अब लगने लगा है कि निजी क्षेत्र न हो तो सरकारी ''अधिनायक तंत्र'' पर लगाम लगाना मुश्किल है। जैसा कि एक सरकारी रिपोर्ट बता रही है, मुजफ्फ़पुर बालिका गृह का निरीक्षण नियमित रूप से होता था, समाज कल्याण विभाग के सहायक निदेशक, जिला मजिस्ट्रेट, सिविल सर्जन और जिला बाल संरक्षण अधिकारी की जिला निरीक्षण समिति नियमित रूप से आश्रय स्थल का निरीक्षण करती थी, 5 साल में समाज कल्याण विभाग के 60 इंस्पेक्शन का दावा किया जा रहा है लेकिन दुखद यह है कि वहां की बच्चियों की दर्ज भरी आवाज़ किसी भी अधिकारी के कानों तक नहीं पहुंची। अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में आने से पहले तक इस कांड का मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर सरकार की निगाहों में सधा-समर्पित इंसान था। यानी पूरा शासन-प्रशासन ब्रजेश ठाकुर के ''जादू'' में कैद रहा होगा, ऐसा सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इसकी वज़ह साफ दिखाई देती है। ब्रजेश ठाकुर वह शख्सियत है जो 11 एनजीओ चलाता था और उसे लगभग 2.5 करोड़ रुपये प्रति वर्ष बिहार सरकार से मिलते थे। वह तीन अखबारों का मालिक भी था, जिनके लिए प्रति वर्ष लाखों रुपये के सरकारी विज्ञापन आते थे। राजनीति, नौकरशाही, अपराध जगत, पुलिस, मीडिया सबके ऊपर रौब था ब्रजेश ठाकुर का...पुलिस सूत्र कहते हैं कि दिल्ली, दरभंगा, समस्तीपुर, बेतिया और पटना में ब्रजेश ठाकुर की करोड़ों की संपत्ति है। इस खौफ की बानगी सिर्फ इस बात से मिल जाती है कि जब बालिका आश्रय स्थल का मामला खुला तो बड़े से बड़ा अखबार भी ब्रजेश ठाकुर का नाम छापने से बच रहा था।  

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पूरे समाज को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज का धन्यवादी होना चाहिए, जिसने अपनी ऑडिट रिपोर्ट से सभ्य समाज के मुंह पर ऐसा तमाचा मारा, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में है। यूरोप, अमेरिका के लोग भी मुंह पर हाथ रखकर अपने दिल से पूछ रहे होंगे कि ये कैसा भारत है, कैसी है यहां की व्यवस्था, जहां मासूमों का गिद्धभोज हो रहा है, वह भी सरकार के संरक्षण में! हमारे नेताओं का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए था लेकिन कुर्सी प्रेम में ये थेथरोलॉजी पर उतर आए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि हम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी नहीं हैं, रिपोर्ट आएगी तब संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी कह रहे हैं कि सीबीआई जांच का आदेश दे दिया गया है... यह कांड उस सरकार, उस व्यवस्था के मुंह पर न मिटने वाली कालिख के समान है जो सदैव गरीबों के उत्थान का राग आलापती रही है।

मैं तो कहता हूं कि विपक्ष भी पाप का उतना ही बड़ा भागीदार है जितना सत्ता पक्ष। सरकार में बैठे मंत्रियों के सूत्र भोथरे हो गए होंगे क्योंकि उन्हें सूत्र के रूप में नौकरशाही की एक लंबी श्रृंखला का वरदान मिल गया, जिनके डीएनए में ही सूचनाएं संपादित कर आगे बढ़ाना बदा है लेकिन विपक्ष को क्या हो गया, उसे तो अपने हथियार धारदार रखने चाहिए थे! क्या उसके सूत्र भी राह भटक गए जो वर्षों से बेसहारा मासूमों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ न उठा सके।

महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता और मानव कल्याण का साधन माना; तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि महात्मा गांधी के असली वारिस होने का दावा करने वाले उनके द्वारा निर्धारित आदर्शों का पालन क्यों नहीं कर रहे? वे उसी व्यवस्था के हिस्सा क्यों बन गए, जिसके खिलाफ जंग लड़ने वे राजनीति में आए थे। एसी कोठियां, दफ्तर, लज़ीज़ व्यंजन, शानदार बैठकी, बाग-क्यारियां, बड़ी-बड़ी गाड़ियां, सरकारी-निजी अंगरक्षकों की पलटन और चमचों की लंबी फौज... शायद आज की राजनीति का यही मिशन, यही सपना है...ये सब मिलने के बाद कहां गरीब और जरूरतमंद! इसके बाद संपादित सूचनाओं के तंत्र में घिरकर जमीन से उठा वही नेता सामंती सोच का बन जाता है, वह भूल जाता है कि उसके हाथों में लोगों ने सत्ता किसलिए सौंपी है?

अब चूंकि मंजू वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है क्योंकि उनके पति चंदेश्वर वर्मा के ब्रजेश ठाकुर से गहरे रिश्ते थे। वह दावा भी कर रही हैं कि दोषी साबित होने पर अपने पति को सूली चढ़ाने में वह पीछे नहीं हटेंगी। लेकिन जिला बाल अधिकार संरक्षण अधिकारी रवि रोशन की माने तो चंदेश्वर वर्मा पर शक की वजह तो बनती ही है। आखिर वे किस हैसियत से बेटियों के आश्रय स्थल में गए थे और जिसकी सूचना कहीं दर्ज नहीं कराई गई। ऐसे ही अनेक नेताओं और अधिकारियों की लिस्ट सामने आनी तय है क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो को यह मामला सौंप दिया गया है। 

एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट में बालिका आश्रय स्थल के सरकारी निरीक्षण का बेहद प्रभावी ढंग से पोस्टमार्टम किया गया है कि कैसे औपचारिकताएं निभाई जाती रहीं और हवश के भेड़िये उन नाबालिग, अनाथ, असहाय और मुसीबत की मारी बेटियों की देह नोचते रहे। नीचे दिये हुए टेबल से देखिये कि निरीक्षण का कितना बड़ा जाल सरकार ने बनाया हुआ है। इससे एक बात तो जाहिर है कि साम-दाम-दंड-भेद के सहारे यहां ''नर्क''बसाया गया था। फूल-सी बेटियों की बेबसी का ऐसा उपहास, वह भी किसी तोंदवाले नेता द्वारा...लोकतंत्र को सड़क पर लाकर नंगा करने से कम नहीं है। मैं वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक की उस बात का समर्थन करता हूं कि हवश के इन भेड़ियों को गांधी मैदान में लाकर फांसी दे देनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी कल्पना करने पर भी लोगों की रुह कांप जाए....

चाहे मुजफ्फरपुर हो या देवरिया, हर जगह बेटियों की आत्माएं घायल हुई हैं, उनके बदन को नोचा-खसोटा गया है...क्या अब भी भगवान कृष्ण इस धरती पर नहीं आएंगे, क्या द्रोपदियों का चीरहरण ऐसे ही होता रहेगा, क्या मासूमों की अस्मत ऐसे ही लुटती रहेगी क्योंकि खेत-खलिहान, गली-मोहल्ले की धूल फांककर पंक्ति के आखिरी व्यक्ति तक सशक्तिकरण की रोशनी पहुंचाने का संकल्प लेने वाले नेता भी अब शहंशाह हो गए हैं...