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क्या हिंदुस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हो सकता है?

icon कल्याण कुमार | 0
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| मई 26 , 2018 , 20:03 IST

बात 1995 की है। महाराष्ट्र के शिवसेना नेता मनोहर सिंह का चुनाव मुंबई हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है, इसे धर्म और आस्था तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इस फैसले को 20 साल बाद 2015 में चुनौती दी गई लेकिन इसे बरकरार रखा गया।

तमाम वैचारिक समूहों की अलग राय हो सकती है लेकिन मैं समझता हूं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के गहरे निहितार्थ हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बेशक अलग-अलग धर्मों, पंथों, जातियों और नस्लों के लोग रहते हों लेकिन उनकी जीवन शैली और सोच में अनेक समानताएं देखी जा सकती हैं। एक छोटा-सा उदाहरण है कि बेशक कोई व्यक्ति किसी भी धर्म का हो, उसकी कल्पना में पत्नी सीता जैसी और पति राम जैसा होता है। कल्पना के ये राम-सीता किसी धर्म या पंथ से नहीं जुड़े हैं बल्कि उस सोच से जुड़े हैं, जो भारत की मिट्टी की पहचान है। संतोषम् परमम् सुखम् दूसरा उदाहरण है, जिसका अहसास किसी भी आम भारतीय से मुलाकात के बाद हो जाता है। एक आम भारतीय उतने की ही अपेक्षा करता है, जिससे उसका जीवन निर्बाध रूप से व्यतीत हो जाए। मध्यकाल के महान संत कबीरदास की इन पंक्तियों में भी भारतीयों के इस संस्कार की अभिपुष्टि होती है - साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय। ऐसी ही अनेक सांस्कारिक पहचान भारतीयों की है जिसका नाता जीवन शैली से तो है लेकिन धर्म और आस्था से कतई नहीं।

Hindutv

इसलिए हिंदुस्तान में हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने की बात गले से नीचे नहीं उतर रही। योजना आयोग के पूर्व सदस्य रजनी कोठारी ने कहा है कि भारतीय समाज बहुलवाद पर आधारित है, जिसमें धर्म से अधिक महत्वपूर्ण जाति है। कहने का आशय है कि ब्राह्मण, कायस्थ, राजपूत, यादव, कुशवाहा जिस तरह से अलग-अलग अस्तित्व हैं, उसी रूप में मुसलमान और ईसाई भी अलग-अलग अस्तित्व के रूप में पहचाने जाते हैं क्योंकि इनमें से किसी में भी स्वाभाविक रूप से आपसी वैवाहिक संबंध स्थापित करने की परंपरा नहीं है। ऐसे में हिंदुत्व एक जीवन शैली के रूप में ही नजर आता है।

14 जून 2018 को अल्पसंख्यक आयोग बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की एक याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है जिसमें 7 राज्यों और 1 संघशासित प्रदेश में हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने के मामले पर सुनवाई होगी। अश्विनी उपाध्याय ने नवंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, पंजाब और लक्षद्वीप में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं और मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अश्विनी उपाध्याय को सलाह दी थी कि वह इस मामले को अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के समक्ष उठाएं। उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर अल्पसंख्यक आयोग के समक्ष इस मामले को रखा। आयोग ने इसके बाद अध्ययन के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई। इसके अध्यक्ष जॉर्ज कूरियन हैं जो अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष भी हैं। इनके अलावा मनजीत सिंह राय और सुलेखा काम्बरे को अध्ययन कमेटी का सदस्य बनाया गया। यह कमेटी 14 जून को विभिन्न पक्षों को सुनकर एक रिपोर्ट तैयार करेगी, जो अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय और कानून मंत्रालय को भेजा जाएगा ताकि आगे की कार्यवाही हो सके।

पूरी मानवता के लिए राजनीति और धर्म का परस्पर संबंध महत्वपूर्ण वैचारिक विषय रहा है। समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुसार राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति...डॉ. लोहिया धर्म को उस रूप में देखते थे जिससे समाज अनुशासित होता है लेकिन आज धर्म के मायने कुछ अलग हैं। इसे जाने-माने साहित्यकार हरिशंकर परसाई की कहानी ''भगत की गत'' में की गई उनकी टिप्पणी '' भक्तों का मूर्ख होना जरूरी है'' के संदर्भ में देखा जा सकता है। इस कहानी में बहुत ही सरल शब्दों में परसाई ने समझाया है कि भगवान का भजन किस तरह दूसरों की परेशानी की वजह बन गया। इसलिए ऐसे गूढ़ विषय पर पूरे समाज की राय लेना आवश्यक है। सबसे बड़ा सवाल यह कि जीवनशैली महत्वपूर्ण है या आस्था? 

भारत में अभी तक मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदाय को ही अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है। हिंदुओं को भी सात राज्यों और संघशासित प्रदेश लक्षद्वीप में अगर अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा मिला तो जीवनशैली से अलग धर्म और आस्था की दृष्टि से हिंदुत्व की पहचान होनी तय हो जाएगी, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं...।