ओपिनियन

सत्ता के लिए ''नैतिकता'' का नाटक

icon कल्याण कुमार | 0
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| मई 18 , 2018 , 20:02 IST

सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर 19 मई की शाम 4.00 बजे कर्नाटक की नवनिर्वाचित येद्दियुरप्पा सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने की चुनौती है। 104 सीटों पर विजयी सबसे बड़ी पार्टी BJP को सरकार बनाने का न्यौता देकर गवर्नर चारों ओर से निशाने पर हैं। उन्होंने कल बीएस येद्दियुरप्पा को 15 दिन में बहुमत साबित करने को कहा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब यह परीक्षा कल होनी है। विधानसभा चुनाव में खंडित जनादेश ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि संविधान विशेषज्ञ भी एक मत नजर नहीं आ रहे हैं इसलिए गवर्नर वजूभाई वाला के विशेषाधिकार इस्तेमाल की तह में जाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई जजमेंट के अनुरूप 28 घंटे में फ्लोर टेस्ट कराने का सुझाव दिया। गवर्नर के विशेषाधिकार और उसके तहत दिए गए आदेश की न्यायिक जांच के मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट 10 सप्ताह बाद करेगा।

कर्नाटक में खंडित जनादेश के बाद जो मुद्दा सबसे अधिक गरमाया हुआ है, वह राजनीतिक शूचिता और नैतिकता का। कांग्रेस और जेडी (एस) गवर्नर के फैसले को अनैतिक करार दे रहे हैं। उनका आरोप है कि जब 117 विधायकों की सूची उन्होंने गवर्नर को दे दी तो BJP को सरकार बनाने का निमंत्रण देना किसी भी सूरत में संवैधानिक नहीं था। वे लोकतंत्र बचाओ आंदोलन कर रहे हैं और न्याय की दुहाई दे रहे हैं तो भारतीय जनता पार्टी चुनाव बाद कांग्रेस और जेडी (एस) गठबंधन को अपवित्र और अनैतिक करार दे रही है। BJP का कहना है कि मतदान के एक दिन पहले तक  कांग्रेस और जेडी (एस) एक-दूसरे पर गंभीर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे थे लेकिन अब सत्ता के लिए बना यह गठबंधन अवसरवादिता है, जनादेश का अपमान है। इसी के साथ BJP यह दावा कर रही है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते गवर्नर ने उसे निमंत्रण दिया और वह बहुमत साबित करके दिखाएगी। विडंबना यह है कि सत्तालोलुपता में "नैतिकता" का यह नाटक जनता को चुपचाप देखना पड़ रहा है क्योंकि मताधिकारी रूपी तीर उसके तरकश से अब निकल चुका है। 

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लोकतांत्रिक परम्पराएं कहती हैं कि जनकल्याण राजनीति की मुख्य धुरी होनी चाहिए लेकिन कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है, उसमें जनता और जनकल्याण की झलक दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। हां, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के दौरान जनादेश को जो सर्वोच्चता दी है, उससे समस्त राजनीतिक दलों को अवश्य सबक लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की पहल से एक बात तय होने की उम्मीद बन गई है कि आने वाले समय में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति के लिए एक सर्वमान्य फॉर्मूला निकल जाएगा। जिस तरह बोम्मई जजमेंट में फ्लोर टेस्ट नियत हो गया, उसी तरह इस बार सरकार बनाने के लिए निमंत्रण देने का विधान भी तय हो जाने की उम्मीद जनता को है।

ध्यान से देखें तो पूरा कर्नाटक चुनाव जुगत की राजनीति पर आधारित नज़र आता है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कोई ऐसा मुद्दा नहीं उछला जिससे कर्नाटक की जनता का भविष्य तय होता। सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में मशगूल रहे। प्रचार-प्रसार में मुद्दों की बात की जाए तो सबने एक-दूसरे को अनपढ़ करार देने की मुहिम छेड़ रखी थी। दिग्गजों के भाषणों में भी दूरदर्शिता का सरासर अभाव था और कर्नाटक की जनता की आकांक्षा-महत्वाकांक्षा कमोबेस हाशिये पर थी। चंद लोकलुभावन मुद्दों को छोड़ दें तो किसी भी दल के पास विकास का ऐसा कोई मसौदा नहीं था, जिससे कर्नाटक की जनता की चुनौतियां खत्म होतीं और उनके भविष्य निर्माण की रूपरेखा बनती। जुगत के इस राजनीतिक भंवर में फंसी जनता की निगाहें अब कल के फ्लोर टेस्ट पर है। अगर येद्दियुरप्पा बहुमत हासिल करते हैं तो भी और जेडी (एस)-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनती है तब भी अगले पांच साल कर्नाटक की जनता के लिए बहुत आसान नहीं रहने वाले हैं...।