ओपिनियन

धिक्कार है नीतीश बाबू, योगी जी!

icon कल्याण कुमार | 0
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| अगस्त 8 , 2018 , 21:28 IST

मुझे पत्रकारिता करते हुए 27 साल से ऊपर हो गए। मैंने कई कांड की कवरेज स्वयं की, संपादन भी किया, लेआउट डिजायन बनाकर छापा भी और टीवी चैनलों में रहते ऑन एयर भी किया-आतंकवाद की घटनाएं भी और सामान्य आपराधिक वारदात भी लेकिन मेरा दिल सबसे अधिक व्यथित हुआ है तो मुज़फ्फरपुर और देवरिया जैसे शर्मसार कर देने वाले कांड से। बदलाव लाने के मकसद से राजनीति में आए नीतीश बाबू और योगी जी धिक्कार है कि आप ऐसे सूत्र विकसित न कर सके जो आपके राज्यों में हो रहे अत्याचार की सूचनाएं आपको पूरी संजीदगी से दे सकें। यह बता सकें कि कार्रवाई नहीं की तो जग हंसाई होगी। आप दोनों भी उन सामंतों की तरह ही निकले, जिनका शासनकाल शोषण और दमन की कहानियों से भरा-पड़ा है। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विषमता समाप्त करने और नारी, दलित, पिछड़ों को शोषण मुक्त करने का बीड़ा उठाए आप दोनों राजनीति में आए लेकिन अफसोस यह है कि आप उसी चक्रव्यूह में फंस गए, जहां संपादित सूचनाएं पहुंचती हैं। वैसी ही सूचनाएं पहुंचती हैं जिनसे साहब का मिज़ाज़ ठंडा रहे। परेशान करने वाली या ऐक्शन लेने लायक सूचनाएं साहब की कोठी के 100 मीटर दूर से ही लौटाने का पुख्ता इंतज़ाम किया जाता है। अखबारों में कोई ऐसी बात छपी हो तो कौन-सी कटिंग साहब के पास पहुंचे और कौन-सी नहीं, इसका भी इंतज़ाम किया जाता है। जमीन से उठे और मुफ़लिसी के दौर में पग-पग पर होने वाली घटनाओं का दीदार करते हुए आप दोनों व्यवस्था के शीर्ष पर पहुंचे और उसी नाकारे सिस्टम के शिकार हो गए, जिनकी वजह से देश में आज भी गरीब, किसान, मजदूर, दलित और नारी का शोषण हो रहा है।

आप बेहतर जानते हैं कि गर्ल शेल्टर होम में कौन रहती हैंचाहे वह मुजफ्फरपुर हो या देवरिया या फिर कोई और स्थान। गर्ल शेल्टर होम देश की उन दुर्भाग्यशाली बेटियों का आश्रय स्थल है, जो अनाथ हैं। इनमें से अधिकतर वे हैं जिनके मां-बाप ने जन्म के बाद ही बेटी होने के कारण उन्हें फेंक दिया। यह आश्रय स्थल है उन बेटियों का, जिनके जीवन में अंधकार है। क्या आपकी सरकारों ने इन बेटियों के भविष्य के लिए कोई रोडमैप प्लान किया है या ब्रजेश ठाकुर जैसे ''राक्षसों'' के हवाले इनका भविष्य छोड़ दिया है?देवरिया मामले के आरोपियों गिरिजा त्रिपाठी, मोहन त्रिपाठी और उनकी बेटी कनकलता त्रिपाठी जैसों के हवाले इन बेसहारा मासूमों की अस्मत की पहरेदारी आखिर क्यों सौंपी गई...शायद यही सोचकर कि इनकी वेदना नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर दब जाएगी...यह धारणा भी रही होगी कि सत्ता इन बेआवाज़ बेटियों, शोषितों के लिए थोड़े मिली है?...इनके लिए कुछ करके क्या मिलेगा? वोट तो ठेकेदार दिलाते हैं? भीड़ भी वही जुटाते हैं। बेशक ठेकेदारों की इस भीड़ में अनेक सांप-बिच्छू-अजगर-घड़ियाल हों, जो इन बेसहारा मासूमों पर पाशविक अत्याचार करते हों, भेड़ियों जैसा उनका आचरण हो, क्या फर्क पड़ता है!

लोकतंत्र हो या राजतंत्र या शासन करने का कोई और तरीका, राजनीति में संवेदना का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। शायद यही वजह है कि नीतीश बाबू आपकी सरकार में समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने अपने पति चंद्रशेखर वर्मा की ब्रजेश ठाकुर से नजदीकियों की वजह से इस्तीफा दे दिया। मुझे तो यही लगता है कि हरप्रीत कौर अगर मुजफ्फरपुर की एसपी न होतीं तो शायद यह मामला उठता ही नहीं और वहशियों का अत्याचार मासूम बेटियों पर जारी रहता! देवरिया में तो इन मासूमों को सजा-संवार कर सफेदपोशों के पास भेज दिया जाता था...क्या यही बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का महान लक्ष्य है? नीतीश बाबू अखबारों और चैनलों में सुर्खियां बनने के बाद भी आप लंबे समय तक चुप रहे, योगी जी, आप तो इन मामलों में सदैव संवेदनशील रहे हैं, फिर भी क्या इन गतिविधियों की सूचना आपके स्वयंसेवक आप तक नहीं पहुंचा पाएफिर तो आपको नए सिरे से अपना संगठन खड़ा करना होगा।

सदैव गरीब, किसान, दलित, नारी उद्धार की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से मेरी प्रार्थना है कि देशभर के शेल्टर होम की व्यवस्थाओं पर जांच बिठाएं और उन बेटियों के उद्धार के लिए सार्थक कदम उठाएं जिनका इस जगत में कोई नहीं है। यह सब लिखते हुए मुझे 2016 की एक घटना याद आ गई। खबर यह थी कि देहरादून के नारी निकेतन में भूख और बीमारी से कुछ संवासनियों की मौत हो गई। वहां भी सूचना के प्रबंधकों ने नीति निर्माताओं के पास यह सूचना न पहुंचने देने का बेहतरीन इंतज़ाम किया। तब मैंने अपनी रिपोर्टर प्रांजलि सिंह को वहां भेजकर रियलिटी चेक कराया और तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के सामने पूरा मसला रखा। मुझे अच्छा लगा कि रावत जी ने तत्काल पूरे उत्तराखंड के नारी निकेतनों की संवासनियों के लिए भोजन, स्वास्थ्य आदि का बजट बढ़ा दिया। एक सरकार ने ऐसा किया तो मुझे अच्छा लगा क्योंकि वे संवासनियां वोट बैंक तो नहीं ही थीं। नीतीश बाबू और योगी जी से अनुरोध है कि व्यवस्था बदलना चाहते हैं तो संपादित सूचनाओं के बजाय सीधे सूचना हासिल करने की व्यवस्था बनाएं। डिजिटल इंडिया का फायदा उठाकर पंक्ति के आखिरी व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना चाहते हैं तो तमाम सूचनाओं के लिए अपने दरवाजे खोल दीजिये। उन व्यवस्थापकों को कहीं और पटक आइये जिनकी वजह से आज आपको शर्मसार होना पड़ रहा है...