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कर्नाटक: राज्यपाल किसे देंगे सरकार बनाने का न्योता, संविधान विशेषज्ञों की अलग-अलग राय

icon सतीश कुमार वर्मा | 0
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| मई 16 , 2018 , 14:29 IST

कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला सरकार बनाने का न्योता देने में उच्चतम न्यायालय के फैसलों को संज्ञान में ले सकते हैं। शीर्ष अदालत ने अपने फैसलों में कहा है कि खंडित जनादेश की स्थिति में सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता दिया जाना चाहिए।

सर्वाधिक विधायक वाली पार्टी कौन- बीजेपी या गठबंधन

यह बात आज संविधान विशेषज्ञों ने कही। हालांकि सर्वाधिक विधायकों वाली पार्टी का निर्धारण कैसे किया जाएगा इसको लेकर विधि विशेषज्ञों की राय बंटी नजर आई। यह सबसे बड़ी पार्टी होगी या गठबंधन होगा इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं दिखी। पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी, वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी, अजीत कुमार सिन्हा और राजीव धवन तथा उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पीबी सावंत और संविधान विशेषज्ञ गोविंद गोयल की राय थी कि राज्यपाल क्या करेंगे इस बारे में अभी सोचना ‘जल्दबाजी’ होगी।

हालांकि उनके पास सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन जिनके पास अधिक विधायक होंगे उन्हें सरकार बनाने का न्योता देने का विकल्प है। रोहतगी ने कहा कि यह स्थापित कानून है कि राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी और यहां भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाना चाहिए, लेकिन न्यायमूर्ति सावंत ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में ऐसा कुछ भी नहीं है जो सरकार बनाने के लिए कांग्रेस - जद (एस) गठबंधन को बुलाने की राह में आड़े आएगा। उनसे अलग राय रखते हुए द्विवेदी और गोयल ने कहा कि इस समय राज्यपाल के लिए फैसला करना जल्दबाजी होगी।

राज्यपाल किसी को भी सरकार बनाने का न्योता दे सकता है, बशर्ते बहुमत हो

इस सवाल को लेकर संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा, 'यह बिल्कुल साफ है कि गर्वनर अपने विचार से किसी को भी सरकार बनाने की आज्ञा दे सकते हैं। लेकिन राज्यपाल अपने विवेक से यह फैसला लेते हैं कि किस दल के पास बहुमत है और वो स्थायी सरकार बना सकता है। इसलिए ऐसे में वो उसी को सरकार बनाने का मौका देते हैं जिसको लेकर यह उम्मीद और राय बनती है कि बहुमत उसके साथ है।
ऐसा ही एक उदाहरण है जब राष्ट्रपति ने अटल बिहारी वाजपेयी को लोकसभा में बहुमत साबित करने से पहले ही प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था लेकिन लोकसभा में वो 1 वोट से बहुमत साबित नहीं कर पाए थे। राष्ट्रपति ने अपने विवेक से फैसला लिया था। इसलिए राष्ट्रपति के पास अधिकार होता है कि वो सबसे बड़ी पार्टी या फिर किसी गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं।

सुनिए क्या कहते हैं संविधान विशेषज्ञ

गोवा और मणिपुर में पहले हुई है राज्यपाल से गलती

गोवा और मणिपुर चुनावों का उल्लेख करते हुए राजीव धवन ने कहा कि इन दो राज्यों में गलती की गई थी क्योंकि सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया गया था। उनकी राय से गोयल ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि संवैधानिक परिपाटी के अनुसार सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए पहले बुलाया जाना चाहिए लेकिन मणिपुर और गोवा जैसे राज्यों में अतीत में कुछ गलतियां हुई हैं।
उन्होंने कहा कि राज्यपाल को इस बात की संभावना तलाशने के लिए सबसे बड़ी पार्टी को पहले बुलाना चाहिए कि वह सरकार बनाना चाहती है या नहीं। अगर वह मना कर देती है तो उन्हें कांग्रेस से सरकार बनाने का अवसर तलाशने का अनुरोध करने का अधिकार होगा।

इसे और स्पष्ट करते हुए द्विवेदी ने कहा कि अंतिम नतीजे के बाद राज्यपाल के लिए अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए स्थिति स्पष्ट होगी। जो भी राज्य में स्थिर सरकार प्रदान करने की स्थिति में होगा उसको ध्यान में रखकर राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। एस आर बोम्मई (1994) और रामेश्वर प्रसाद मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसलों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि राज्यपाल पर उस पार्टी को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी है जो स्थिर और टिकाऊ सरकार प्रदान कर सकती है। यह गठबंधन भी हो सकता है।

क्या है एसआर बोम्मई मामला (1994)

गोयल ने हालांकि कहा कि बोम्मई मामले का मौजूदा परिदृश्य में कुछ खास महत्व नहीं है क्योंकि यह कर्नाटक में सत्तारूढ़ पार्टी को सदन में अपना बहुमत साबित करने का मौका दिए बिना राष्ट्रपति शासन लगाने से संबंधित था। उन्होंने कहा कि रामेश्वर प्रसाद मामले में 2005 के फैसले की मौजूदा संदर्भ में कुछ प्रासंगिकता है क्योंकि बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ने सबसे बड़े चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया था और इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी कि सरकार गठन के लिए विधायकों के खरीद फरोख्त की संभावना है।

राज्यपाल कांग्रेस और जेडीएस को दे न्योता

सावंत ने कहा कि कानूनी दृष्टि से ऐसा लगता है कि राज्यपाल जद (एस) और कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे क्योंकि उनके विधायकों की संख्या भाजपा के विधायकों की संख्या से अधिक है, लेकिन उन्हें सदन में अपना बहुमत साबित करना होगा।

सरकार चलाने के लिए मेरी राय में जद (एस) और कांग्रेस को बुलाया जाएगा। इसके विपरीत, रोहतगी ने कहा कि यहां (कर्नाटक) में भाजपा भारी अंतर से आगे चल रही है। राज्यपाल भाजपा को आमंत्रित करने के लिए बाध्य हैं। सरकार गठन के लिए राज्यपाल को पार्टी को तर्कसंगत समय संभवत: एक सप्ताह का समय देना होगा और तब सदन के पटल पर बहुमत साबित करना होगा। हालांकि सभी विधि विशेषज्ञों में एक बात पर आम सहमति थी कि कर्नाटक के जनादेश ने राज्यपाल को फैसला करने में अपने विवेक और विशेषाधिकार का इस्तेमाल करने की पूरी छूट दे दी है।

अब ऐसे में पेच फंस रहा है कि आखिकार जब किसी भी पार्टी को वहां स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो सरकार किसकी बनेगी और बहुमत पेश करने का पहला मौका किसे मिलना चाहिए।


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सतीश कुमार वर्मा

लेखक न्यूज वर्ल्ड इंडिया में वेब जर्नलिस्ट हैं

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