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वो जवानी जो सचमुच देश के काम आई.... (बलिदान दिवस- खुदीराम बोस)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 11 , 2018 , 15:57 IST

देश की आजादी की लडाई का इतिहास तमाम क्रांतिकारियों के बलिदान और उनके खून से लिखा गया है। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारियों की सूची में एक नाम खुदीराम बोस का भी है। जो मात्र 18 वर्ष की अवस्था में शहीद हुए थे। शहीद होने के बाद इनकी दीवानगी युवाओं पर इस कदर बढ़ी की लोगों ने एक खास किस्म की धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

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आजादी की लड़ाई के महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस आज ही के दिन शहीद हुए थे। खुदीराम बोस को महज 18 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। खुदीराम बोस को बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित केन्द्रीय कारा में फांसी दी गयी थी। खुदीराम हंसते-हंसते फांसी पर झूल गये थे। आज खुदीराम को उनकी पुण्यतिथि के मौके पर देश याद कर रहा है।

साल 1908 में 11 अगस्त के दिन खुदीराम बोस शहीद हुए थे। उनकी शहादत को देखकर देश के युवाओं में आजादी की एक ललक उत्पन्न हो गई थी, जिससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला। 3 दिसंबर 1889 को बंगाल में जन्मे खुदीराम बोस बंगाल विभाजन(1905) के बाद स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था।

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खुदीराम नें नौवीं कक्षा में ही पढ़ाई छोड़ दी और मातृ भूमि की रक्षा के लिए निकल पड़े। वह बाद में रेवलूशन पार्टी के सदस्य भी बने। खुदीराम को पुलिस ने 28 फरवरी 1906 को सोनार बंगला नाम का एक इश्तेहार बांटते समय गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन उस वक्त खुदीराम मौका देखकर भागने में कामयाब हो गए थे। 1907 में बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए विस्फोट की घटना में भी खुदीराम बोस शामिल थे।

30 अप्रैल, 1908 को खुदीराम और उसके साथी ने किंग्सफोर्ड को मारने के लिए उसकी बग्गी पर बम फेंक दिया था। किंग्सफर्ड बग्गी में मौजूद नहीं था उसकी जगह एक अंग्रेज अधिकारी की पत्नी और बेटी थीं। जिनकी मौत हो गई थी। जिसके बाद खुदीराम को पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्हें फांसी की सजा दे दी थी।

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क्रांतिकारी जीवन-:

स्कूल छोड़ने के बाद वह रेवल्यूशन पार्टी का सदस्य बने। अपनी शुरुआती भागीदारी में वो वन्देमातरम के पर्चे बांटा करते थे। 6 दिसम्बर 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गये बम विस्फोट की घटना में भी बोस का हाथ था।

उसी समय किंग्सफोर्ड नाम का एक मजिस्ट्रेट हुआ करता था, वह क्रांतिकारियों को लेकर अपने कठोर रवैये की वजह से कुख्यात था। इस वजह से क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या करने का निश्चय किया। उस समय उसकी तैनाती बिहार के मुज्जफरपुर थी। युगान्तर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेन्द्र कुमार घोष ने किंग्सफोर्ड को मुज्जफरपुर में ही मारने का निर्णय लिया। इस काम के लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद चाकी को चुना गया।

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दोनों क्रांतिकारी मुज्जफरपुर पहुंच कर कई दिनों तक एक धर्मशाला में रुक कर हमले के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगे। 30 अप्रैल 1908 की शाम को किंग्सफोर्ड अपनी पत्नी के साथ स्थानीय क्लब में पहुंचे। उसी समय मिसेज कैनेडी और उनकी बेटी भी अपनी बग्गी में बैठकर क्लब जा रहे थे।

उनकी बग्गी का रंग भी बिल्कुल किंग्सफोर्ड की बग्गी की तरह ही था। खुदीराम और प्रफुल्ल ने किंग्सफोर्ड की बग्गी समझकर उस पर बम फेंका, जिससे उसमें सवार मां और बेटी दोनों की मौत हो गई।

दोनों करीब 25 किलोमीटर भागने के बाद पुलिस के हाथ आ ही गये। पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर प्रफुल्ल चाकी ने ख़ुद को गोली मार ली। खुदीराम पकड़े गये और उन पर हत्या का मुकदमा चला। 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. 11 अगस्त 1908 को उन्हें तड़के सुबह 6 बजे फांसी पर चढ़ा दिया गया।

शहादत के बाद उन पर बंगाल में कविताएं और वीर रस के गीत लिखे गये। जिन्हें आज़ादी के दीवाने बड़े फक्र से गाते थे। आज जिस उम्र को हम बचपने की उम्र मानकर व्यर्थ के कामों में गंवा देते हैं। उस अल्हड़ उम्र में भारत मां के इस सच्चे सपूत द्वारा दिए गये बलिदान को युगों-युगों तक याद रखा जायेगा।


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