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सावन की शिवरात्रि क्यों है महादेव को प्रिय, जानें भोले नाथ को प्रसन्‍न करने की विधि

आशुतोष कुमार राय, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 9 , 2018 , 11:24 IST

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:।।

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:।।

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे 'न' काराय नमः शिवायः।।

सावन की शिवरात्र‍ि हर साल सावन महीने में मनाई जाती है। वैसे तो हर महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मास शिवरात्रि कहा जाता है। आज सावन की शिवरात्रि है। सावन के महीने में शिवरात्रि का विशेष महत्व माना गया है।

यह दिन जीवमात्र के लिए महान उपलब्धि प्राप्त करने का दिन है। इस दिन प्रकृति इंसान को अपने आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने के लिए प्रेरित करती है। शिवरात्रि का पर्व शिव और शक्ति का अभिसरण है। यह भगवान शंकर का सबसे प्रिय दिन है, अपनी आत्मा को पुनीत करने का दिन है। इस दिन व्रत करने से हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है, निरीह जीवों के प्रति मन में दया भाव उपजता है।

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शिव भक्‍त साल भर इस शिवरात्रि का इंतजार करते हैं। अपने आराध्‍य भगवान शिव शंकर को प्रसन्‍न करने के लिए भक्‍त कांवड़ यात्रा पर जाते हैं। इस यात्रा के दौरान शिव भक्‍त गंगा नदी का पवित्र जल अपने कंधों पर लाकर सावन शिवरात्रि के दिन भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।

क्‍यों मनाई जाती है सावन शिवरात्र‍ि...?

महादेव शंकर को सभी देवताओं में सबसे सरल माना जाता है और उन्‍हें मनाने में ज्‍यादा जतन नहीं करने पड़ते। भगवान सिर्फ सच्‍ची भक्ति से ही प्रसन्‍न हो जाते हैं। यही वजह है कि भक्‍त उन्‍हें प्‍यार से भोले नाथ बुलाते हैं। सावन के महीने में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्‍व है जिसका सीधा संबंध सावन की शिवरात्रि से है। सावन की शिवरात्र‍ि मनाने के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं।

Sawan-Shivratri

हालांकि सबसे प्रचलित मान्‍यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव घटाघट पी गए। इसके परिणामस्‍वरूम वह नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित हो गए। त्रेता युग में रावण ने शिव का ध्यान किया और वह कांवड़ का इस्‍तेमाल कर गंगा के पवित्र जल को लेकर आया। गंगाजल को उसने भगवान शिव पर अर्पित किया। इस तरह उनकी नकारात्‍मक ऊर्जा दूर हो गई।

महादेव को क्यों प्यारा है शिवरात्रि का दिन-:

देवा दी देव महादेव बहुत भोले माने जाते हैं, उनका सच्चे मन से नामभर लेने से वह भक्तों की सभी मनोकामना पूरी कर देते हैं। सावन में ही भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया और उनसे कहा था, जो भी भक्त सावन के महीने मेरी पूजा करेगा, उनकी सभी मनोकामनाएं मैं पूरा करूंगा।

क्‍या होती है कांवड़ यात्रा..?

कांवड़ यात्रा हर साल सावन के महीने में शुरू होकर सावन की शिवरात्रि के साथ खत्‍म होती है। कांवड़ एक खोखले बांस को कहा जाता है और इस यात्रा पर जाने वाले शिव भक्‍त कांवड़‍िए कहलाते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान शिव भक्‍त हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री, बैद्यनाथ, नीलकंठ, देवघर समेत अन्‍य स्‍थानों से गंगाजल भरकर अपने स्‍थानीय शिव मंदिरों के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। गंगाजल को कांवड़ यानी कि बांस के डंडे पर लाया जाता है। खास बात यह है कि इस जल या कांवड़ को पूरी यात्रा के दौरान जमीन से स्‍पर्श नहीं कराया जाता है।

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रात्रि काल में पूजन विधि -: 

दिनभर अधिकारानुसार शिवमंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए अर्थात्‌ जो द्विज हैं और जिनका विधिवत यज्ञापवीत संस्कार हुआ है तथा नियमपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करते हैं। उन्हें ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करना चाहिए परंतु जो द्विजेतर अनुपनीत एवं स्त्रियां हैं, उन्हें प्रणवरहित केवल शिवाय नमः मंत्र का ही जप करना चाहिए।

रुग्ण, अशक्त और वृद्धजन दिन में फलाहार ग्रहण कर रात्रि पूजा कर सकते हैं, वैसे यथाशक्ति बिना फलाहार ग्रहण किए रात्रिपूजा करना उत्तम है।

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रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान शास्त्रकारों ने किया है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर जाकर अथवा घर पर ही सुविधानुसार पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर और तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का इस प्रकार संकल्प करे-देशकाल का संकीर्तन करने के अनंतर बोले-

'ममाखिलपापक्षयपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थ च शिवपूजनमहं करिष्ये।'

अच्छा तो यह है कि किसी वैदिक विद्वान ब्राह्मण के निर्देश में वैदिक मंत्रों से रुद्राभिषेक का अनुष्ठान करवाएं।

सावन शिवरात्र‍ि के मंत्र और जयकार-: 

ऊपर बताई गई सामग्री चढ़ाने के बाद इन मंत्रों का सही-सही उच्‍चारण करें:

-: ॐ नमः शिवाय 
-: बोल बम
-: बम बम भोले
-: हर हर महादेव


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