राजनीति

14 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखने वाले करुणानिधि कभी नहीं हारे चुनाव

दीपक गुप्ता, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 7 , 2018 , 20:43 IST

तमिलनाडु की राजनीति के सबसे बड़े सियासी सूरज का अस्त हो गया है। द्रविड आंदेलन की उपज और द्रविड़ आंदोलन की उपज मुथुवेल करुणानिधि का निधन हो गया है। उन्होंने 94 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। तमिलनाडु और देश की राजनीति में अपना दखल रखने वाले एम करुणानिधि अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत हिंदी के विरोध से 14 साल की उम्र से शुरु की।M_____3 जून, 1924 को नागापट्टिनम जिले के तिरूकुवलई में जन्में मुथुवेल करुणानिधि तमिल फिल्मों में नाटककार और पटकथा लेखक भी थे। उन्होंने 100 से ज्यादा किताबें भी लिखी हैं। हिंदी के विरोध से राजनीति की शुरुआत करने वाले करुणानिधि 80 साल के करियर में कभी चुनाव नहीं हारे। करीब 8 दशक सक्रिय राजनीति में रहे करुणानिधि अपने राजनीतिक करियर में तमिलनाडु के 5 बार मुख्यमंत्री बने और रिकॉर्ड 13 बार विधायक चुने गए।

परिवार:- एम करुणानिधि 3 शादियां कीं। पहली पत्नी का नाम पद्मावती, दूसरी का दयालु और तीसरी का रजति है। पद्मावती का देहांत हो चुका है। उनके 4 बेटे एमके मुथु, एमके अलागिरी, एमके स्टालिन, एमके तमिलारासु और दो बेटियां एमके सेल्वी और कनिमोझी हैं।

14 साल की उम्र में द्रविड़ आंदेलन में हिस्सा लिया:- करुणानिधि जब किशोरावस्था में थे तभी से द्रविड़ आंदोलनों में हिस्सा लेने लगे थे। अलागिरिस्वामी के भाषणों से प्रभावित होकर करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में 1938 में जस्टिस पार्टी जॉइन किया। जब डीएमके के संस्थापक सी. एन. अन्नादुरई ने अपने राजनीतिक गुरु ई. वी. रामास्वामी से अलग होकर 1949 में डीएमके बनाई तब करुणानिधि उनके साथ आए। करुणानिधि डीएमके के संस्थापक सदस्यों में से एक बने।

1957 में पहली बार विधायक चुने गए:- करुणानिधि ने पहली बार 1957 में करुर जिले स्थित कुलिथली सीट से जीत हासिल कर तमिलनाडु विधानसभा में प्रवेश किया। अपने चुनाव क्षेत्र में उन्होंने खेतों में काम करने वाले मजदूरों के हक में आंदोलन चलाया। विधानसभा चुनावों में जीत और किसानों के लिए आंदोलन चलाने के बाद करुणानिधि का राजनीतिक करियर तेजी से आगे बढ़ा। 1962 में करुणानिधि विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने।

1967 में पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने:- 1967 में पूरे राज्य में हिंदी भाषा थोपे जाने को लेकर आंदोलन चरम पर था। डीएमके को इस साल चुनावों में जीत मिली और करुणानिधि तमिलनाडु की अन्नादुरई सरकार में पहली बार मंत्री बने। 1969 में कैंसर से पीड़ित अन्नादुरई की मौत के बाद करुणानिधि उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी बने। तब वह सीएम बनने के साथ-साथ पार्टी प्रमुख और संरक्षक भी बने। करुणानिधि ने 1969 में एक बार पार्टी की बागडोर संभाली, तब से आजीवन वह पार्टी के शीर्ष पर रहे। वह 1969-71, 1971-76, 1989-91, 1996-2001 और 2006-2011 तक 5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे।

विवादित बयान:- करुणानिधि ने रामसेतु परियोजना को लेकर कई विवादित बयान दिए। एक बार उन्होंने कहा था, "कुछ लोग कहते हैं कि 17 लाख साल पहले यहां एक व्यक्ति था, जिसका नाम राम था। उसने बिना छुए राम सेतु का निर्माण किया था। कौन है यह राम? किस इंजीनियरिंग कॉलेज से उसने स्नातक किया? इसका किसी के पास कोई प्रमाण है? 
करुणानिधि ने अप्रैल 2009 में स्वीकार किया कि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) प्रमुख प्रभाकरण उनका अच्छा दोस्त था। लिट्टे ने ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कराई थी। 

'कलाईनार' यानी कला के विद्वान:- अपने समर्थकों के बीच करुणानिधि 'कलाईनार' यानी 'कला का विद्वान' नाम से मशहूर थे। उनकी पहचान फिल्म पटकथा लेखक, पत्रकार और तमिल आंदोलनकारी की भी रही। उन्होंने 100 से ज्यादा किताबें भी लिखीं। करुणानिधि ने तमिल साहित्य, फिल्म लेखन और राजनाति में लंबी और महत्वपूर्ण पारी खेली। 94 साल की उम्र में कावेरी अस्पताल में उन्होंने आंखें हमेशा के लिए बंद कर ली। देश द्रविड़ आंदोलन के इस योद्धा का सदैव याद रखेगा।


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