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खत्म हो रहा है मोदी मैजिक? क्या कांग्रेस इसे 2019 में भुना पाएगी?

icon सतीश कुमार वर्मा | 1
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| दिसंबर 12 , 2018 , 15:04 IST

हिन्दी बेल्ट में बीजेपी की हार मोदी की हार है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी के मुख्यमंत्री नहीं हारे हैं बल्कि मोदी हारे हैं। यह 'मोदी मैजिक' की हार है। अगर मोदी मैजिक (Modi Magic) का करिश्मा थोड़ा भी चला होता है तो कांग्रेस इन राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी बन कर नहीं उभरती। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने अंतिम समय तक कांग्रेस से क्लोज फाइट किया। यहां वोटों की गिनती टी 20 मैच की तरह लोगों की धुकधुकी बढ़ा रही थी। राजस्थान में भी कांग्रेस बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा सकी और 99 के फेर में फंस गई। मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस जरूर बड़ी ताकत बन कर उभरी है लेकिन एक कंफर्टेबल मेजोरिटी नहीं ला सकी।

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जाहिर है, इन राज्यों में मोदी के खिलाफ, केंद्र सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा था, जिसे कांग्रेस कायदे से नहीं भुना सकी। मोदी के खिलाफ गुस्से को कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा वोटों में तब्दील करने में कायम नहीं हो सकी। छत्तीसगढ़ में जरूर कांग्रेस को बड़ी जीत मिली है।

हर चुनाव में ये बात उभरती है कि क्या नरेंद्र मोदी का करिश्मा बरकरार है या खत्म हो रहा है। हर जीत का सेहरा पार्टी मोदी के सिर पर बांध देते हैं, लेकिन जब हार होती है तब उसका ठीकरा किसी और के सिर पर फोड़ दिया जाता है। तीन राज्यों में हार के बाद इस बार मोदी ने हार की जिम्मेवारी नहीं ली। हार की जिम्मेवारी तीनों राज्य के सीएम ने ली।

पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह राज्यों के विधान सभा चुनावों में माहौल बनाने और हार को जीत में तब्दील करने का जो माद्दा प्रधानमंत्री मोदी में बताने के लिए थकते नहीं है, वो बता सकते हैं कि क्या इस बार मोदी माहौल बनाने में कामयाब नहीं हो सके? छत्तीसगढ़ में तीन बार सत्ता में रमन सिंह सरकार को जितने जोरदार तरीके से जनता ने नकारा है वह दिखाता है कि कम से कम यहां मोदी की रैलियों का कोई असर नहीं हुआ। तो स्थानीय मुद्दे, राज्य स्तरीय नेता और माहौल को मोदी का जादू बदल नहीं पाया।

मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान भी चौथी बार सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में थे और अंतिम समय तक कांटे की टक्कर बना रहे थे। उससे तो पता चलता है किसी के जादू के चलने का सबूत नहीं दिखता है। दोनो राज्यों में नेताओं की अपनी छवि बनी हुई थी, लोगों में बदलाव की चाह थी पर नेताओं के प्रति इस कदर कोई गुस्सा नजर नहीं आ रहा था।

इन चुनावों में ये साबित हुआ कि मोदी की आंधी अब क्लीन स्वीप की कूबत नहीं रखती है। मोदी ब्रांड या मोदी मैजिक इन चुनावों के बाद अब ज्यादा असरदार नहीं रही है। उत्तर प्रदेश जहां मोदी मैजिक के चलते बीजेपी को इतना भारी बहुमत मिला था वहां भी लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। यूपी में दो धुर विरोधी पार्टी मायावती की बसपा और अखिलेश यादव की सपा मजबूत विपक्ष बनने के लिए दोस्ती करने के लिए तैयार हैं। जाहिर है मोदी के नाम पर पार्टी आसानी से 2019 में फिर सत्ता में आएगी यह कहना फिलहाल निश्चित नहीं है।

मोदी ब्रांड को बनाने वाले को एक बार से फिर से सोचना होगा कि को अगर अपनी स्थिति सुधारनी है तो महज़ प्रचार, जुमले, राम नाम, 3-डी तकनीक में प्रचार, चाय पर चर्चा और सोशल मीडिया के मैनेजमेंट के सहारे नैया पार करने की कोशिश से काम नहीं चलेगा।