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'मंटो' के अफसाने को पर्दे पर बखूबी निभा रहे हैं नवाजुद्दीन (Review)

शुभा सचान , न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| सितंबर 21 , 2018 , 17:06 IST

बॉलीवुड की आज दो फिल्में मंटो और बत्ती गुल मीटर चालू रिलीज हुईं। दोनों ही फिल्में सामाजिक मुद्दों से जुड़ी हुई थीं। लेकिन क्या दर्शक उन फिल्मों से जुड़ सके आइए जानते हैं फिल्म रिव्यू में।

फिल्म ‘मंटो’

'मंटो' लेखक सआदत हसन मंटो की जिंदगी के उन चार सालों के इर्द-गिर्द घूमती है जब भारत विभजन हुआ और करोड़ों हिंदू-मुस्लमान को विस्थापित होना पड़ा था। समाज के सांप्रदायिक नजरिए को देखते हुए मंटो की सोच थी- ‘मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए। सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं है कि हज़ारों लोग मारे गए। सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि हज़ारों लोग बेवजह मारे गए'

फिल्म में मंटो की 'ठंडा गोश्त' और 'टोबा टेक सिंह' जैसी विवादित कहानियों का जिक्र किया दिखाया गया है। मंटो की इन कहानियों को भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय भी समाज के लिए श्राप माना गया था।

फिल्म में मंटो के अफसानों में मर्द-औरत के रिश्तों के अलावा दूसरा जो आईना दिखता है वो बंटवारे के बाद बंबई (मुंबई) छोड़कर लाहौर जाना। इस दर्द को मंटो ने 'टोबा टेक सिंह' जैसी लघु कहानियाँ में बयां किया है। बंबई छोड़ने के बाद मंटो को दोस्त और बॉलीवुड कलाकार श्याम चड्ढा की दोस्ती का दर्द पूरी जिंदगी सताता रहा। मंटो का किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बड़ी ही बखूबी निभाया है। लेकिन बिना मंटो की कहानी जाने फिल्म को देखना किसी पहेली से कम नहीं है।

यहां देखिए 'मंटो' का ट्रेलर

फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू

श्री नारायण सिंह के निर्देशन में बनी फिल्म "टॉयलेट- एक प्रेम कथा" को काफी सराहा गया था. फिल्म को तमाम अवॉर्ड्स के साथ-साथ नेशनल अवॉर्ड भी दिया गया. अब श्री नारायण ने बिजली बिल के गंभीर मुद्दे पर आधारित फिल्म "बत्ती गुल मीटर चालू" बनाई है।

कहानी

फिल्म की कहानी उत्तराखंड के टिहरी जिले की है। कहानी तीन दोस्तों सुशील कुमार पंत (शाहिद कपूर), ललिता नौटियाल (श्रद्धा कपूर) और सुंदर मोहन त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) की है। ये एक-दूसरे के जिगरी यार हैं। सुशील कुमार ने वकालत की है, वहीं ललिता डिजाइनर हैं और सुंदर ने एक प्रिंटिंग प्रेस का धंधा शुरू किया है। उत्तराखंड में बिजली की समस्या काफी गंभीर है और ज्यादातर बिजली कटी हुई ही रहती है। सुंदर की फैक्ट्री के बिजली का बिल हमेशा ज्यादा आता है और एक बार तो 54 लाख रुपये तक का बिल आ जाता है। इस वजह से वो शिकायत तो दर्ज करता है, लेकिन उसकी बात सुनी नहीं जाती। एक ऐसा दौर आता है जब वह बेबसी में आत्महत्या कर लेता है। इस वजह से सुशील और ललिता शॉक हो जाते हैं। सुशील अपने दोस्त के इस केस को लड़ने का फैसला करता है। कोर्टरूम में उसकी जिरह वकील गुलनार (यामी गौतम) से होती है। अंततः एक फैसला आता है, जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी। फिल्म आम दर्शकों को पहाड़ की संस्कृति की झलक जरूर दिखाती है।

फिल्म की कमियां

फिल्म की करीब तीन घंटे की लंबाई बहुत ज्यादा है। इसे एडिटिंग टेबल पर आधा घंटे कम किया जा सकता था। सेकंड हाफ में कोर्ट रूम ड्रामा मजेदार है। शाहिद कपूर ने फिल्म में अच्छी ऐक्टिंग की है। खासकर कोर्ट रूम के सीन्स में यामी गौतम के मुकाबले में वह काफी जमे हैं। वहीं श्रद्धा कपूर ने भी ठीक-ठाक ऐक्टिंग की है। 

यहां देखिए 'बत्ती गुल मीटर चालू' का ट्रेलर


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