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ई-टेंडर स्कैम: व्यापम के बाद शिवराज सरकार पर 3000 करोड़ रूपये घोटाले का आरोप

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| सितंबर 6 , 2018 , 16:38 IST

मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला के बाद अब एक नया घोटाला सामने आया है। अभी व्यापम घोटाला की आंच धीमी नही हुई थी कि शिवराज सरकार के लिए विधानसभा चुनाव से पहले एक और घोटाला चुनौती बनकर आ गया है। इस बार ई-टेंडर प्रकिया में बड़ा घोटाला सामने आया है। इस घोटाले से यह सामने आया है कि इसमें बोली लगाने वाली कंपनियों को पहले ही सबसे कम बोली का पता चल जाता था। ऐसा बताया जा रहा है कि यह घोटाला करीब 300 करोड़ का है।

इस घोटाला में अॉनलाइन टेंडर देने की प्रक्रिया में गड़बड़ी की मामला सामने आया है। इसमें प्राइवेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने की बात सामने आ रही है।

कैसे पता चला यह घोटाला

इटी के जांच में पता चला है कि मध्यप्रदेश जल निगम ने आंतरिक तौर पर इनक्रिप्टेड डॉक्यूमेंट में फेरबदल किया और इसे प्राइवेट कंपनियों के हिसाब से बदला गया। इसके कॉन्ट्रैक्ट इस साल मार्च में खोले गए थे। बोली में भाग लेने वाली एक बड़ी टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कंपनी ने भी इसकी शिकायत की थी। MPJNL के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन से मदद मांगी थी कि कैसे सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर में सेंध लगी।

इस मामले की खास बात यह है कि मामले की जांच कराने वाले अधिकारी से चार्ज लेकिर किसी दूसरे अधिकारी को दे दिया गया है। ऐसे में जांच पर भी सवाल उठने लगे हैं।

कम अंतर से टेंडर हारने पर हुई शिकायत

इस साल मार्च में जल निगम की ओर से तीन कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने थे। इनके लिए बोली लगाई गई थी। हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स की पड़ताल में पता चला है कि मध्य प्रदेश जल निगम को चेताया गया था कि ऑनलाइन दस्तावेजों में छेड़छाड़ की जा रही है। आरोप है कि इसमें प्राइवेट कंपनियों और शीर्ष नौकरशाही की रजामंदी शामिल है। ईटी के मुताबिक एक बड़ी टेक्नॉलजी और इंजिनियरिंग निर्माण कंपनी ने भी इस बारे में शिकायत की थी। इस कंपनी के हाथ से कुछ टेंडर बहुत कम अंतर से निकल गए थे। उन्होंने इंटरनल असेसमेंट के बाद शिकायत की थी।

ऑनलाइन पोर्टल से छेड़छाड़

MPSEDC के एमडी मनीष रस्तोगी 1994 बैच के अधिकारी हैं और कंप्यूटर साइंस बैकग्राउंड के हैं। उन्होंने इस मामले की आंतरिक जांच की। जांच में रस्तोगी ने पाया कि राजगढ़ और सतना जिले में ग्रामीण पानी की सप्लाई स्कीम के 3 कॉन्ट्रैक्ट में फेरबदल कर हैदराबाद की 2 कंपनियों और मुंबई की 1 कपनी को सबसे कम बोली लगाने वाला बनाया गया।पता चला कि कुछ बोली लगाने वालों को अवैध तौर पर पहले ही पता चल गया कि सबसे कम बोली कितने की है। इन 3 प्रोजेक्ट के लिए कॉन्ट्रैक्ट की रकम 2,322 करोड़ रुपए थी। ईटी के मुताबिक इसी तरह PWD के 6 कॉन्ट्रैक्ट, जल संसाधन विभाग, एमपी रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन की ई-बोली में भी गड़बड़ी हुई। इसके लिए रस्तोगी ने टीसीएम और एंटारेस सिस्टम को 6 जून को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था।

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एक नही, कई विभागों में घोटाला

MPSEDC ने पत्र लिखकर 6 और टेंडर को रद्द करने के लिए कहा। आंतरिक जांच में OSMO IT सॉल्यूशन पर सवाल उठ रहे हैं। OSMO को समान नंबर की आईडी के लिए 5 पासवर्ड दिए गए थे। इनको अवैध रूप से उपयोग कर बोलियों में हेराफेरी की गई। OSMO के डायरेक्टर वरूण चतुर्वेदी ने घोटाले में उनकी कंपनी के किसी तरह के रोल से इंकार किया है। रस्तोगी ने इस मामले पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया। मध्यप्रदेश के चीफ सेक्रेटरी बीपी सिंह के आदेश के बाद सभी 9 टेंडर जांच के लिए इकोनॉमिक अफेंस विंग को सौंप दिए गए।

ईओडब्लू के एक अधिकारी ने ने 3000 करोड़ रुपए की रकम का अनुमान लगाया है। ईओडब्लू के एडीजी मधु कुमार ने कहा कि 'केस जांच के गंभीर चरण में है।' सूत्रों से पता चला है कि MPSEDC के टेंडरिंग से जुड़ा 9 टीबी का डेटा जब्त कर लिया गया है। बीपी सिंह के मुताबिक 'इस मामले की जांत EOW कर रहा है। विभाग का कोई रोल इसमें नहीं है।' दूसरी तरफ टीसीएस ने एक बयान में अपने किसी कर्मचारी के इस घोटाले में शामिल होने से इंकार किया है। एंतरिस ने भी कहा कि उन्होंने कारण बताओ नोटिस का जवाब दे दिया है। गड़बड़ी एप्लीकेशन में नहीं बल्कि बाहर से हुई है।

MPSEDC ने बाद में सभी विभागों से 6 टेंडर रद्द करने को कहा है। MPSEDC की आंतरिक जांच में OSMO IT सलूशन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए। साल 2016 में पोर्टल के खराब प्रदर्शन के बाद इस कंपनी से संपर्क किया गया था। बताया गया है कि OSMO को उन्हीं आईडी के पासवर्ड दिए गए थे, जिनसे बोली को कम करने के लिए ऑनलाइन सिस्टम में सेंध लगाई गई।

OSMO के निदेशक वरुण चतुर्वेदी ने घोटाले में किसी भी तरह की भूमिका से साफ इनकार किया है। चतुर्वेदी ने बताया है कि उन्हें 2016 में टेंडर बनाने और देखने के लिए सीमित चीजों के पासवर्ड दिए थे। उन्हें नहीं पता कि इन पासवर्ड्स का इस्तेमाल टेंडर्स से छेड़छाड़ करने के लिए कैसे किया गया। MPSEDC के ऑफिस में उन्होंने परफॉर्मेंस टेस्टिंग की और उसकी रिपोर्ट शेयर कर दी गई। बाद में आगे टेस्ट नहीं कराए गए और उन्हें काम से हटा दिया गया।

रिपोर्ट के बावजूद दर्ज नहीं हुई FIR

टीसीएस और ऐंटरेस की आंतरिक जांच में यह बात साफ हो गई थी कि तीनों कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए डेटा के साथ छेड़छाड़ की गई लेकिन EOW ने प्राथमिक जांच ही दर्ज की है, एफआईआर नहीं। MPSEDC और संबंधित कंपनियों के अधिकारियों से पूछताछ और डेटा की जांच शुरू हो गई है। बताया गया है कि सभी 9 टेंडर्स की फरेंसिक जांक की जाएगी, जिससे जिम्मेदारी तय की जा सके।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि आगामी चुनाव को देखते हुए पुलिस जांच में नरमी बरत रही है। एक ओर जहां स्तोगी को पद से हटा दिया गया है, वही जांच के घेरे में मौजूद अधिकारी अभी भी अपनी जगह पर बने हुए हैं। वही विपक्ष पार्टी कांग्रेस ने पीएम नरेन्द्र मोदी को खत लिखकर मामले की जांच CBI या सुप्रीम कोर्च के निगरानी में कराने की मांग की है।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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