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जानें क्या है मुगलसराय जंक्शन का इतिहास और क्यों बदला गया इसका नाम

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| अगस्त 5 , 2018 , 20:24 IST

भातीय रेलवे में मुगलसराय स्टेशन अब एक इतिहास में दर्ज हो गया। आज यानि 5 अगस्त 2018 से यह स्टेशन अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से जाना जाएगा। पिछले 156 सालों से जिस रेलवे स्टेशन को आप मुगलसराय जंक्शन के नाम से जानते थे, अब से इसे पंडित दीन दयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन के नाम से जानेंगे। नाम बदल चुका है और बदला हुआ नाम लिखा जा चुका है। रेल मंत्री पीयूष गोयल ने इसकी घोषणा कर दी है। इस घोषणा के दौरान भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहें। अब यह ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन पंडित दीन दयाल उपाध्याय हो गया है।

मुगलसराय के मण्डल रेल प्रबन्धक पंकज सक्सेना ने बताया कि गोयल रेलवे जंक्शन के नये नाम की घोषणा करने के साथ-साथ उसके यार्ड को स्मार्ट यार्ड बनाने, रूट रिले इंटरलाकिंग तथा रेलवे स्टेशन पर अन्य विकास कार्य कराने का भी एलान किया। 'एकात्म एक्सप्रेस' ट्रेन को हरी झंडी दिखाए। यह ट्रेन सप्ताह में दो दिन सुलतानपुर के रास्ते चलाई जाएगी।

इस कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अलावा रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा, उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य तथा अन्य वरिष्ठ भाजपा नेता भी मौजूद रहें।

भगवा हुआ स्टेशन

इस बीच, सम्पूर्ण रेलवे स्टेशन को केसरिया रंग में रंगा जा रहा है और परिसर में प्रवेश और निकास द्वार के साइनबोर्ड के साथ-साथ प्लेटफार्म के नाम को भी बदला जा रहा है।

कैसे बना मुगलसराय से दीन दयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन

'एकात्म मानववाद' का संदेश देने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारक दीन दयाल उपाध्याय फरवरी 1968 में मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास ही संदिग्ध अवस्था में मृत पाये गये थे।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस साल जून में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखने का फैसला किया था। मंत्रिपरिषद की बैठक में मंजूरी के बाद इस प्रस्ताव को रेल मंत्रालय के पास भेजा गया था।
आपको बता दें कि गदर के बाद 1862 में पूर्वी भारत के दूसरे सबसे बड़े रेलवे स्टेशन का नाम मुगलसराय जंक्शन पड़ा, यानी यह 156 साल पुराना है, इसे पूरे पूर्वी भारत का रेलवे का द्वार माना जाता था। लेकिन आज से पूरी तरह से यह नाम खत्म हो गया। दीनदयाल उपाध्याय जो बीजेपी के वैचारिक प्रणेता माने जाते हैं, उनके नाम से अब यह रेलवे स्टेशन जाना जाएगा।

कई बार नाम बदलने की कोशिश अब हुआ सफल

1992 में भी मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलने की कोशिश की गई थी लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने तब इसे मानने से मना कर दिया था। कल्याण सिंह के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पहली बार इसका नाम बदलने की कोशिश वर्ष 1992 में हुई थी। लेकिन इस बार BJP के प्रदेश अध्यक्ष और चंदौली से सांसद महेंद्र पांडे ने यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था जिसके बाद BJP ने अपनी इस पुरानी मांग को परवान चढ़ाया।

इसलिए उठी नाम में बदलाव की मांग

जनसंघ के संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमयी मौत 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय जंक्शन पर हुई थी और मुगलसराय जंक्शन के यार्ड के खंभा नंबर 1276 के पास उनका शव मिला था, जिसके बाद से मुगलसराय जंक्शन संघ और बीजेपी के समर्थकों के लिए एक तीर्थ जैसा बन गया था और लंबे समय से इसकी मांग चल रही थी कि मुगलसराय जंक्शन का नाम दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखा जाए। कई वर्षो के बाद यह सफल हो सका।

क्या है मुगल सराय स्टेशन से कनेक्शन

पंडित दीनदयाल अपनी निष्ठा और ईमानदारी के लिए भी जाने जाते थे। उनका मानना था कि हिंदू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं बल्कि भारत की संस्कृति है। अखंड भारत के समर्थक रहे, उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को परिभाषित किया और समाज के सर्वांगीण विकास और उत्थान के लिए भी अनेक कार्य किए। कहा जाता है कि उपाध्याय ने ही 'वसुधैव कुटुम्बकम' की अवधारणा दी थी।

मुगलसराय स्टेशन का निर्माण 1862 में उस समय हुआ था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी हावड़ा और दिल्ली को रेल मार्ग से जोड़ रही थी। इस स्टेशन के निर्माण के 106 साल बाद 11 फरवरी 1968 को पं. दीनदयाल रेलवे जंक्शन के निकट पोल संख्या 1276 के पास रहस्यमय हालात में मृत अवस्था में पाए गए थे।

कौन थें पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा के नगला चंद्रभान नाम के गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी हाई स्कूल की शिक्षा राजस्थान के सीकर में प्राप्त की थी। दीनदयाल ने अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा पिलानी में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। उसके बाद बी.ए. की शिक्षा ग्रहण करने के लिए कानपूर आ गए जहां वो सनातन धर्मं कॉलेज में भर्ती हो गए। उसके बाद उन्होंने बी.ए. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और एम.ए. की पढ़ाई के लिए आगरा चले गए।

1937 में आरएसएस से जुड़े

अपने एक दोस्त बलवंत महाशब्दे की प्रेरणा से वे साल 1937 में वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए। साल 1955 में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर प्रदेश के प्रांतीय संगठक (प्रान्त प्रचारक) बन गए। उन्होंने लखनऊ में राष्ट्र धर्म प्रकाशन नामक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की और यहां से "राष्ट्र धर्म" नाम की मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया।

जनसंघ के गठन में अहम भूमिका

1950 में डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और देश में एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच बनाने का कार्य शुरू किया, जिसमें दीनदयाल उपाध्याय ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसके बाद 21 सितंबर 1951 को उन्होंने उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक सम्मेलन का सफल आयोजन किया। इसी सम्मेलन में देश में एक नए राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ की राज्य इकाई की स्थापना हुई। वे 1953 से 1968 तक भारतीय जनसंघ के नेता रहे।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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