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Movie Review: स्पोर्ट्स पर राजनीति से लड़ने और न हारने की जिद है ‘मुक्‍काबाज’

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| जनवरी 12 , 2018 , 12:43 IST

अनुराग कश्यप डायरेक्टेड फिल्म ‘मुक्काबाज’ 12 जनवरी को रिलीज हो चुकी है। फिल्म में मुख्य कलाकार हैं विनीत कुमार, जिमी शेरगिल, जोया हुसैन और राजेश तेलैंग। यह फिल्म एक बॉक्सिंग मेलोड्राम है। इरोज इंटरनेश्नल और आनंद एल राय की पेशकश में स्पोर्ट्स फील्ड में खिलाड़ियों के साथ होने वाले भेद-भाव पर सवाल उठाया है। अनुराग की फिल्म ‘मुक्काबाज’ में खिलाड़ियों के साथ होने वाली राजनीति को दर्शाया गया है।

कहानी-

श्रवण कुमार (विनीत कुमार सिंह) एक बॉक्‍सर है और बरेली के बाहुबली और डिस्‍ट्रिक बॉक्‍सिंग फेडरेशन के कोच भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल) के यहां बाकी कई बॉक्‍सरों की तरह बॉक्‍सिंग की ट्रेनिंग ले रहे हैं। लेकिन भगवान दास इन बॉक्‍सरों को कोई ट्रेनिंग नहीं देता और उनसे अपने घर के काम कराता है। फिल्‍म के पहले ही सीन में श्रवण कुमार अपने बॉक्सिंग के जुनून के चलते भगवान दास से भिड़ जाता है और उसे एक जोरदार पंच जड़ देता है। कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्‍ट है कि जाति से राजपूत श्रवण को भगवान दास की भतीजी सुनैना (जुहा हुसैन) से पहली नजर में ही प्‍यार हो जाता है। सुनैना, बोल नहीं सकती है। अब यही है इस बॉक्‍सर श्रवण का संघर्ष, जो अपनी मुक्‍केबाजी के जुनून के लिए अपने पति तक से भिड़ जाता है उसे अपना प्‍यार पाने के लिए अपनी इसी बॉक्सिंग से दूर करने की कोशिश की जाती है। अब इस फिल्‍म में बॉक्‍सर जीत होगी या प्रेमी की, इसे देखने के लिए आपको सिनेमाघर जाना पड़ेगा। अनुराग कश्‍यप की भाषा में कहें तो 'मुक्‍काबाज' उनकी पहली लव स्‍टोरी है और यह सही भी है। लेकिन इस लव स्‍टोरी में खेल संगठनों में होने वाली पॉलिटिक्‍स, छोटे शहरों में जाति व्‍यवस्‍था और ऊंच-नीच झेलते लोग, महिलाओं का शोषण जैसे कई विषयों को छूने की कोशिश की गई है।

एक्टिंग-

बॉक्सर श्रवण कुमार की भूमिका में विनीत सिंह ने कमाल कर दिया है। पर्दे पर उन्हें देखते समय लगता नहीं कि वो एक्टिंग कर रहे हैं। बॉक्सिंग उनके रग-रग में दिखाई देता है। लैंग्वेज में यूपी का टच लाना भी इतना आसान नहीं है लेकिन वो उसे भी बखूबी कर गए हैं। लीड एक्टर के रूप में ये विनीत की पहली फिल्म है। इस मुद्दे पर फिल्म बनाने का आइडिया भी विनीत का ही था जिन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिखी है। 2013 से ही विनीत इस फिल्म के लिए प्रोड्यूसर ढ़ूढ रहे थे। उनकी शर्त ये थी कि जब भी फिल्म बनेगी लीड भूमिका वही निभाएंगे। अनुराग कश्यप तो वैसे भी स्टार एक्टर्स को लेकर फिल्में नहीं बनाते। उनकी खासियत ही है कि वो एक्टर कहानी और स्क्रिप्ट पर ही पूरा फोकस करते हैं। विनीत का जुनून इस फिल्म में भी दिखाई देता है। ज़ोया हुसैन इस फिल्म से डेब्यू कर रही हैं वो इस फिल्म में ऐसी लड़की की भूमिका में हैं जो सुन सकती है लेकिन बोल नहीं सकती। उन्होंने भी इसको बहुत ही मजबूती से निभाया है।

म्यूजिक-

म्यूजिक इस फिल्म की जान है। 'मुश्किल है अपना मेल प्रिये', 'पैंतरा', 'बहुत हुआ सम्मान' ये कुछ ऐसे गाने हैं जो पहले से ही पॉपुलर हैं लेकिन अगर आपने नहीं सुना है आप इसे गुगगुनाते हुए सिनेमाहॉल से निकलेंगे।

कमजोर कड़ियां-

फिल्म देखते हुए काफी लम्बी लगती है और इसकी लेंथ को लगभग 20 मिनट छोटा किया जाता तो यह और भी ज्यादा क्रिस्प और कट टू कट लगती। लम्बी होने के वजह से समय-समय पर आपको मोबाइल देखने का समय भी मिल जाता है। एडिटिंग शार्प की जा सकती थी। कहीं-कहीं गाने बड़े हैं, जिन्हें एडिट किया जाता तो फिल्म बांधे रख पाने में सक्षम लगती।

क्यों देखें-

ये अनुराग की ऐसी फिल्म है जिसमें गालियां नहीं हैं और आप इसे पूरे परिवार के साथ देेख सकते हैं। दूसरी वजह ये फिल्म खुद है जो आपको इंटरटेन भी करेगी और वास्तविक हालात से रूबरू भी कराएगी। साल की शुरुआत अगर इतनी बेहतरीन फिल्म से हो रही है तो आपको इसे मिस नहीं करना चाहिए।

फिल्म में एक डायलॉग है कि 'बॉक्सिंग पर बनी फिल्में 40 करोड़ कमा लेती हैं और बॉक्सिंग देखने 40 लोग भी नहीं आते...' ये लाइन कमाई को लेकर मेकर्स की उम्मीदों को बयां करती है। लेकिन इसके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। तब तक आप फिल्म इन्जॉय कीजिए।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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