ख़ास रिपोर्ट

कपिल सिब्बल की कलम से... भारत के भविष्य के साथ CAG ने किया समझौता

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 2
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| अक्टूबर 28 , 2017 , 14:24 IST

यूपीए सरकार के पूर्व मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कैग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान उठाया है। उन्होंने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने आलेख में लिखा है कि जिस घाटे का हमें अनुमान नहीं उस पर तो हम कार्रवाई करते हैं, लेकिन वास्तविक घाटे पर नहीं। यह विरोधाभासी है लेकिन है पूरा सच। नोटबंदी से देश को 2,50,000 करोड़ का नुकसान हुआ, लेकिन इसपर इसलिए कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि कैग ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार के नीतिगत फैसले पर वह कोई कार्रवाई नहीं कर सकता।

इतना ही नहीं इसके लिए किसी को जिम्मेवार भी नहीं ठहराया जा सकता है। भले ही मेडिकल इमरजेंसी के लिए बैंक में नोट बदलने के दौरान 100 लोगों की मौत हो गई हो, लेकिन देश की सर्वोच्च संस्था कैग ने यूपीए सरकार की उस नीतिगत फैसले पर सवालिया निशान लगा दिया था जिसके तहत स्पेक्ट्रम का आवंटन किया जाना था, कोल ब्लॉक आवंटित किए जाने थे। दलील दी गई थी इससे काफी नुकसान होगा। भले ही घाटे का आंकड़ा काल्पनिक तथ्यों पर आधारित था।

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कहना न होगा कि देश की सर्वोच्च संस्थाएं और एजेंसी टूल्स की तरह काम करती हैं। भले ही सरकारी एजेंसियों के फैसले से आम जनजीवन और देश की अर्थव्यवस्था ही क्यों न प्रभावित हो रही हो। बीते दिनों की कई ऐसे वाकयात हैं जिसमें देश की स्रवोच्च जांच संस्था NIA और CBI सत्ता प्रतिष्ठानों की सहूलियत के हिसाब से यू-टर्न ले रही है।

देश के सरकारी बैंकों के हालात कितने खस्ताहाल हैं यह सबके सामने है। बैंकों का एनपीए लगातार दानव की तरह बढ़ रहा है। बैंकों के एनपीए से उबरने के लिए सरकार ने अभी हाल ही में बेलआउट पैकेज की घोषणा की है। लेकिन टेलिकॉम और कोल सेक्टर की लगातार गिरती माली हालत को उबारने के लिए सरकार अभी भी जूडीशरी पर नजर गड़ाए हुए है। नतीजा है कि कई बड़े निवेशक चाहे वह घरेलू हो या विदेशी उनका भरोसा सरकार की नीतिगत संस्था और जांच एजेंसी पर उठते जा रहा है। कैग अगुआ बनकर कहती है कि प्राकृतिक संसाधनों पर किसी का स्वामित्व बिना किसी प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के अगर अलॉट किया जाए तो सरकार के खजाने पर भारी असर पड़ेगा। अब अगर कैग की इस धारणा को सही मान लिया जाए तो कैग की इस नीति के कारण टेलीकॉम सेक्टर 5 लाख करोड़ के कर्जे में डूबी हुई है। बैंकिंग सेक्टर पर 7.5 लाख का कर्ज है।

पावर सेक्टर पूरी तरह से कोयला पर निर्भर है। कोल इंडिया के पास देश के बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त कोयला नहीं है। यही स्थिति स्टील और सीमेंट सेक्टर का है। कोल ब्लॉक आवंटन पर रोक की वजह से देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कोल नेशनाइलेजशन एक्ट की बात कही है। नतीजा है पावर औऱ स्टील सेक्टर में निवेश का प्रवाह रुक गया है। कई नीलामी कैंसिल कर दी गई है। कई नीलामी पर सरकारी जांच एजेंसी टारगेट कर रही है। कोयला और देश की ऊर्जा क्षेत्र को राजनीतिक बना दिया गया है।

कपिल सिब्बल ने कहा कि देश की सर्वोच्च संस्थाओं, जांच एजेंसी और कोर्ट को देश के व्यापक हित में सोचना चाहिए न कि राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से फैसले करने चाहिए।


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