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मीडिया भैंस नहीं है! सरकारी डंडे से उसे मत हांकिए

icon कुलदीप सिंह | 2
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| अगस्त 2 , 2018 , 20:01 IST

अजीब उधेड़बुन में हूं... बार बार मन में सवाल उठ रहा है कि हिन्दी समाचार चैनल एबीपी न्यूज़ के संपादक रहे मिलिंद खांडेकर से उनके इस्तीफे की वजह पूछूं या न पूछूं? उनके फेसबुक प्रोफाइल को सुबह से कई बार देखा, लोगों के कमेंट पढ़े लेकिन चाहकर भी उनसे इस्तीफे की वजह न पूछने का फैसला किया।

सरल व्यक्तित्व वाले मिलिंद खांडेकर ने 14 साल एबीपी चैनल में रहे और अपने विजन से उन्होने हिन्दी पत्रकारिता को नया आयाम दिया। मिलिंद ने ABP न्यूज़ को एग्रेसिव और जनमानस का चैनल होने का ताज़ पहनाया लेकिन उन्हें आखिर चैनल छोड़कर अचानक क्यों जाना पड़ा? ये सवाल मेरे जैसे पत्रकारों के लिए एक छोटी सी मिस्ट्री बन गया है। मैने कई सहयोगियों से पूछा भाई क्या हो सकता है? कुछ लोगों ने कहा सुना है चैनल के एंकर और प्रखर टीवी पत्रकार अभिसार शर्मा को भी ऑफ एयर (यानी एंकरिंग से हटाया जाना) कर दिया गया है। 

उधेड़बुन चल रही थी, सवाल दिमाग में कौंध रहे थे कि अचानक 19 जुलाई को मिलिंद खांडेकर द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई एक जरुरी सूचना दिखी।

कई दिनों से ये ख़बर मीडिया के गलियारे में घूम रही थी कि एबीपी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के तेजी से पॉपुलर हो रहे शो 'मास्टरस्ट्रोक' के प्रसारण के दौरान सिग्नल डिस्टर्ब हो रहे हैं। 9 बजे प्रसारित होने वाले इस शो में जनता से जुड़े वो मुद्दे उठाए जा रहे थे जो शायद सरकार में बैठे लोगों को पसंद नहीं है, मसलन मोदी सरकार के वादों की हकीकत क्या है? मन की बात में जो बातें आदरणीय प्रधानमंत्री कहते हैं उनकी सच्चाई क्या है? गांव, मजदूर, किसानों की समस्याएं क्या है? आदि आदि...तो क्या इसीलिए मिलिंद की एबीपी न्यूज़ से विदाई हो गई? 

मीडिया जगत के कई मित्र मिलिंद खांडेकर के इस्तीफे से हैरत में हैं। मूलत: एक बांग्ला भाषी अखबार से देश का प्रतिष्ठित न्यूज़ समूह बने एबीपी ने मिलिंद खांडेकर का इस्तीफा क्या इस वजह से ले लिया कि वो सरकार से सवाल पूछने पूछवाने का अपना पत्रकारिता का धर्म निभा रहे थे? वैसे इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि स्वामी-भक्ति में लीन देश के 2-3 दिग्गज समाचार चैनलों से इतर एबीपी का न्यूज़ कंटेट सरोकार वाला था (था इसलिए लिखा आगे रहेगा या नहीं पता नहीं) जाहिर सी बात है इसमें मिलिंद खांडेकर की भूमिका थी। पुण्य प्रसून वाजपेयी अर्से बाद अपने रंग में दिख रहे थे तभी अचानक सरकारी डंडा चल गया शायद! अगर मेरी बातों में ज़रा सी भी सच्चाई है तो इतना तो तय है इस प्रकरण के बाद एबीपी न्यूज़ की विश्वसनीयता शर्तिया गिरेगी, जब कुछ गलत न हो जाए का भय जीवन मूल्यों से बड़ा हो जाता है तो विश्वसनीयता गिरना तय हो जाता है फिर चाहे वो व्यक्ति हो या संस्थान... 

अब यक्ष प्रश्न ये है कि आखिर पूर्ण बहुमत वाली सरकार को सरोकार के सवालों से डर क्यों लगता है? आमतौर पर व्यक्ति अपनी छवि की चिंता करता है, कमियां छुपाता है लेकिन सरकारों को ऐसा नहीं करना चाहिए। मीडिया तो है ही इसलिए कि वो कमियां दिखाए ताकि खुद को जनता के चुने हुए नुमाइंदे बताने वाले नेताओं और सरकारों को उनके उत्तरदायित्व याद रहें। मीडिया की चलती जबान पर ताला लगाने से, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुचलने से कुछ नहीं होने वाला। एक मिलिंद खांडेकर जाएगा तो दूसरा आ जाएगा 'अपने हिसाब का' ये सोच ख़तरनाक है। स्वामीभक्ति न करने वाले पत्रकारों की नौकरी रहे या जाए उन्हें फर्क नहीं पड़ता, मिलिंद खांडेकर को भी नहीं पड़ेगा, लेकिन मालिकों को फोन लगवाकर संपादक हटवाने की जो परंपरा चली है वो लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है। एक वो 1975 की इमरजेंसी थी जो घोषित थी पता था सरकार ने नागरिकों और प्रेस के अधिकार छीन लिए हैं, एक ये इमरजेंसी है जो अघोषित है। एक बार फिर से प्रेस की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। सबकुछ दबे छुपे किया जा रहा है ताकि लोगों को कुछ पता न लगे, उन लोगों को जिन्होने सरकार बनाई है। चुनाव निकट है इसलिए हुक्म के गुलाम सरकारी डंडे से मीडिया को हांक रहे हैं। अब उन्हें कौन समझाए मीडिया कोई भैंस तो है नहीं।