बादशाह ज़िंदा होता तो संगीत सोम का क्या होता?

icon कुलदीप सिंह | 1
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| अक्टूबर 18 , 2017 , 15:19 IST

बीजेपी विधायक संगीत सोम के बयान पर हल्ला मचा हुआ है कि 'ताजमहल भारतीय संस्कृति पर एक धब्बा है'। मोहब्बत की निशानी पर ओछी बहस छिड़ी हुई है। फायर ब्रांड संगीत सोम ने बीजेपी के लिए नई मुश्किल खड़ी कर दी है, कुछ भक्तों ने सोचा होगा कि ताजमहल-ताजमहल चिल्लाने से अमित शाह के बेटे पर लगे आरोपों से शायद पीछा छूट जाए लेकिन ये सोम का बयान तो उल्टा पड़ रहा है।

खुद यूपी के मुख्यमंत्री भी अपने विधायक की बात से इत्तेफाक नहीं रख पा रहे हैं। ज़रा गौर करें तो यहां बात इतिहास बदलने वाले एजेंडे की है। योगी थोड़ा डिफेंसिव इसलिए हो गए हैं क्योंकि बतौर मुख्यमंत्री सीधे सीधे ताजमहल को बेकार और बेतुका नहीं बता सकते। वैसे मुझे शक है कि क्या संगीत सोम बादशाह शाहजहां के बारे में बहुत गहराई से जानते हैं? मुझे तो लगता है कि सोम बादशाह का असली नाम भी किसी रैली में बिना रुके पुरजोर तरीके से नहीं बोल सकते....बादशाह शाहजहां का असली नाम अल् आजाद अबुल मुजफ्फर शाहब उद-दीन मोहम्मद खुर्रम था, जाहिर है नाम बड़ा है और पूरा याद रखने में किसी को भी दिक्कत हो सकती है।

बीजेपी और संघ से जुड़े कुछ लोग नहीं नहीं रूकिए ये मैं गलत लिख रहा हूं, आप कह सकते हैं कि ये आरएसएस का एजेंडा है कि भारत का इतिहास बदल दिया जाए... ख़ासतौर पर 'मुगलिया'

जैसे दिल्ली के लुटियन जोन में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर डॉ. अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया, वैसे वो जो बदलना चाहते थे वो कुछ और नाम रखना चाहते थे लेकिन विवाद बढ़ा तो डॉ. कलाम का नाम देकर बात संभालने की कोशिश की गई। उदाहरण कई हैं जैसे अभी अभी ताजा-ताजा मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रख दिया गया। कुछ लोग ताना देंगे उसमें क्या गलत है जी, कांग्रेस सत्ता में 60 साल रही तो कई महत्तवपूर्ण स्थलों और संस्थानों का नाम नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर कर दिया गया अब बीजेपी आई है तो वो भी करेगी। ये तर्क सही हो सकता है लेकिन क्या स्टेशनों और सड़कों का नाम बदलने के लिए भारत की जनता ने नरेन्द्र मोदी को चुना है?

क्या संगीत सोम की सनक 16वीं सदी (1632) में बने ताजमहल को मिटा सकती है?

बात भी अजीब है और सवाल भी ..अरे इतिहास बदलकर आखिर क्या हासिल हो जाएगा? जो पढ़ चुके हैं उन्हें बेवकूफ बनाया नहीं जा सकता और जो भविष्य में पढ़ेंगे उन्हें बेवकूफ बनाने की गलती न की जाए तो बहुत अच्छा। 1627 में बादशाह जहांगीर की मौत के बाद कम उम्र का शाहजहां गद्दी पर बैठा था। शाहजहां के शासनकाल को मुगल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल कहा जाता है। शाहजहां का अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल बनवाना आपको फिजूलखर्ची लग सकता है लेकिन सच्चाई ये है कि यही फिजूलखर्ची करीब 400 साल बाद भी भारत को दुनिया में एक मकाम दिए हुए है। हर साल लाखों लोग इस बेहतरीन कारीगिरी के नमूने को देखने जाते हैं।

इतिहास को लोग अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर पेश करते रहे हैं, कुछ लोग कहते हैं कि शाहजहां ने अपने कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे ताकि वो इतनी खूबसूरत इमारत दोबारा न बना सकें, लेकिन इस बात को भी इतिहास में तथ्यों के साथ कहीं पेश नहीं किया गया है। कहते हैं शाहजहां बहुत उदार नहीं था लेकिन इतिहास पर गौर करें तो वो बदनसीब जरूर था। अपनी बीवी की याद में बेशकीमती ताजमहल बनवाने वाले बादशाह को उसी के बेटे औरंगजेब ने जिंदगी के आखिरी 8 साल क़ैद में रखा।

अगर बादशाह आज जिंदा होता तो ताजमहल पर छिड़ी बहस से शर्मसार ज़रूर होता .....शायद वो कहता कि ये जो रैलियों में विकास विकास चिल्लाते हो बस यही करो! इतिहास बदलने की क्या जरूरत है?

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