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एक थी अमृता: प्यार की परिभाषा वो खुद थीं... उनकी कलम ने जो लिखा वो नगमा बन गया

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 31 , 2018 , 14:44 IST

क़लम ने आज गीतों का क़ाफ़िया तोड़ दिया
मेरा इश्क़ यह किस मुकाम पर आ गया है

देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे

जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी

उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी...

ये कुछ पंक्तियां हैं अमृता प्रीतम की लिखी कविता मुकाम की। जिन लोगों ने अमृता प्रीतम को पढ़ा है और उन्हें जाना है वह ये बात बखूबी जानते हैं कि अमृता की ये कविता किस ओर इशारा करती है। दरअसल, अमृता प्रीतम की ये कविता मशहूर शायर, गीतकार साहिर लुधियानवी से उनकी जुदाई का किस्सा है।

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अमृता प्रीतम जानती थीं कि उनके मुक्त और स्वतंत्र व्यक्तित्व को समाज पचा नहीं सकेगा, लेकिन फिर भी उन्होंने स्वयं को बांधना स्वीकार नहीं किया। एक पूरा विद्रोही जीवन जिया और स्याही में कलम डुबोकर बदलाव की इबारत रची। शताब्दियों तक उनका जीवन दूसरों, विशेष कर स्त्रियों को आजादी की उड़ान भरने की प्रेरणा देता रहेगा।

हमें कुछ भी कहने से पहले उन दोनों के प्यार की कहानी जानना जरूरी है। ये कहानी शुरू होती है सीमा पार के शहर लाहौर से जहां अमृता का जन्म हुआ था। अमृता का जन्म 31अगस्त 1919 में गुजरांवाला (पंजाब-पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा भी वहीं पर हुई। उन्होंने किशोरावस्था से ही कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू कर दिया था।

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लाहौर में अमृता और साहिर अक्सर दोनों मिला करते थे। शायद दोनों प्रेम में थे। जिस अमृता के साथ साहिर का नाम लिया जाता था वो नाम बदलकर बाद में इमरोज हो गया। लेकिन इससे पहले की कहानी जानना ज्यादा जरूरी।

अमृता 11 साल की थीं तभी उनकी माताजी का निधन हो गया, इसलिये घर की ज़िम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गयी। अमृता ने विभाजन का दर्द सहा था, और इसे बहुत क़रीब से महसूस किया था। उनकी कई कहानियों में आप इस दर्द को स्वयं महसूस कर सकते हैं।

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विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली में आ बसा। अब अमृता ने पंजाबी के साथ-साथ हिन्दी में भी लिखना शुरू किया। उनका विवाह 16 साल की उम्र में ही एक संपादक से हुआ, ये रिश्ता बचपन में ही मां-बाप ने तय कर दिया था। यह वैवाहिक जीवन भी 1960 में, तलाक के साथ टूट गया।

1960 में अपने पति से तलाक के बाद, इनकी रचनाओं में महिला पात्रों की पीड़ा और वैवाहिक जीवन के कटु अनुभवों का अहसास को महसूस किया जा सकता है।

अब बात फिर से लाहौर की जहां अमृता की शादी से पहले की कहानी है। अपनी जीवनी रसीदी टिकट में अमृता एक दौर का जिक्र करते हुए बताती हैं कि किस तरह साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। अमृता को लत थी, सिगरेट की नहीं साहिर की और साहिर का चले जाना नाकाबिल-ए-बर्दाश्त।

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दरअसल जहां से प्रेम को परवान की जरूरत होती है वहां जुदाई को जगह नहीं मिलती। अमृता के लिए साहिर से प्रेम इस कदर परवान चढ़ चुका था कि साहिर के जाने के बाद वो उनके पिए सिगरेट की बटों को जमा करती थीं और उन्हें एक के बाद एक अपने होठों से लगा कर वो साहिर को महसूस करती थीं।

ये वो आदत थी जिसने अमृता को सिगरेट तक की लत लगा दी। अब वक्त करवट लेने वाला था साहिर को जाना था लेकिन सिगरेट ने जीवन में जगह बना ली थी। इस तरह अमृता को सिगरेट पीने की लत लग गई जो आजीवन बरकरार रही।

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एक वक्त के बाद साहिर मुंबई आ गए और अमृता पीछे छूट गईं लेकिन दोनों के दिल से एक दूसरे के लिए प्यार खत्म नहीं हुआ। दोनों अक्सर खतों में एक दूसरे से मिला करते थे लेकिन खत कभी पूरे नहीं हुए। गायिका सुधा मल्होत्रा की तरफ साहिर के झुकाव ने भी इस दूरी को और बढ़ाया। पर जब दिल के तार जुड़े हों तो दूरियां क्या कर सकतीं हैं। दोनों एक साथ तो रहे नहीं पर साहिर के गीतों-नज़्मों में और अमृता की रचनाओं में एक-दूसरे के लिए प्यार और उस प्यार का दर्द आसानी से देखा जा सकता है।

1958 में साहिर के बाद उन्हें ‘इमरोज़’ से इश्क़ हुआ। या यूं कहें कि इमरोज़ को उनसे इश्क़ हुआ। दोनों एक ही छत के नीचे वर्षों तक साथ रहे मगर दोनों के कमरे अलग हुआ करते थे। इमरोज़ को साहिर और अमृता की दास्तां की ख़बर थी मगर वह इस बात से बिल्कुल सहज थे। दोनों का रिश्ता बहुत अनूठा था, उन्होंने कभी एक-दूसरे से नहीं कहा कि वो उनसे प्यार करते हैं।

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लेकिन एक किस्सा है जो न बताया जाए तो ये पूरा लिखा अधूरा ही रह जाएगा। शायद एक खत की तरह। इमरोज अमृता के जीवन का साया हो गए थे बावजूद इसके कि न कभी अमृता ने और न हीं कभी इमरोज ने एक दूसरे से प्रेम का इजहार किया था।

इमरोज अमृता को जगह-जगह स्कूटर पर बैठा कर घूमने ले जाते थे और इस दौरान अमृता लगातार इमरोज की पीठ पर अपनी अंगुलियों से हर्फ दर हर्फ कुछ लिखा करती थीं और इमरोज को ये बात मालूम थी कि पीठ पर बार-बार साहिर लिखा जा रहा होता है। शायद इमरोज ने भी ये मान लिया था कि वो साहिर नाम के आसमान के नीचे बनी छत हैं।

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अमृता के जीवन का आखिरी समय बहुत तकलीफ और दर्द में बीता था। बाथरूम में गिर जाने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई थी और उसके बाद मिले दर्द ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। इस दौरान इमरोज ने अमृता की सेवा में खुद को झोंक दिया था न जाने कितने ही काम के ऑफर तक ठुकरा दिए। इमरोज इस दौरान उन्हें नहलाने, कपड़े बदलने से लेकर सब काम में मदद करते थे।

वो उनसे बातें करते, उन पर कविताएं लिखते, उनकी पसंद के फूल लाकर देते। 31 अक्टूबर 2005 को अमृता ने आखिरी सांस ली लेकिन इमरोज कहते हैं कि अमृता आज भी उनके साथ हैं, उनके बिल्कुल करीब।

विभाजन की पीड़ा को लेकर उनके उपन्यास पिंजर पर एक फ़िल्म भी बनी है, जो अच्छी ख़ासी चर्चा में रही। अमृता ने लगभग 100 पुस्तकें लिखीं और इनकी काफ़ी रचनाएं विदेशी भाषाओं में भी अनुदित हुईं।

अमृता प्रीतम को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इनमें प्रमुख हैं 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कार, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार; (अन्तर्राष्ट्रीय) और 1982 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार।

प्रमुख रचनाएं:

उपन्यास– पांच बरस लंबी सड़क, पिंजर, अदालत,कोरे कागज़, उन्चास दिन, सागर और सीपियां, नागमणि, रंग का पत्ता, दिल्ली की गलियाँ, तेरहवां सूरज।

आत्मकथा– रसीदी टिकट

कहानी संग्रह– कहानियां जो कहानियां नहीं हैं, कहानियों के आंगन में

संस्मरण– कच्चा आंगन, एक थी सारा।

कविता संग्रह– चुनी हुई कविताएं

 


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