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पनामा पेपर्स में नहीं मिली नवाज शरीफ को राहत, SC ने खारिज की पुनर्विचार याचिका

icon सतीश कुमार वर्मा | 0
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| सितंबर 15 , 2017 , 16:01 IST

पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने पनामा पेपर्स मामले में 28 जुलाई को आए फैसले के खिलाफ शुक्रवार को अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके बच्चों की समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर दिया। डॉन ऑनलाइन के अनुसार, अदालत ने सभी याचिकाकर्ताओं के वकीलों की बहस पूरी होने के बाद समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायाधीश आसिफ सईद खोसा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई की। इस मामले में अदालत के 28 जुलाई को आए फैसले में नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से अपदस्थ कर दिया गया था और शरीफ, उनके बच्चों बेटे हुसैन और हसन और बेटी मरियम नवाज, दामाद मोहम्मद सफदार और वित्त मंत्री मोहम्मद डार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप तय करने के निर्देश दिए थे। 

क्या है पनामा पेपर्स केस

- पिछले साल ब्रिटेन में पनामा की लॉ फर्म के 1.15 करोड़ टैक्स डॉक्युमेंट्स लीक हुए थे। इसमें बताया गया था कि व्लादिमीर पुतिन, नवाज शरीफ, शी जिनपिंग और फुटबॉलर मैसी ने कैसे अपनी बड़ी दौलत टैक्स हैवन वाले देशों में जमा की। लीक हुए टैक्स डॉक्युमेंट्स में इस बात का पता चला था कि कैसे दुनियाभर के 140 नेताओं और सैकड़ों सेलिब्रिटीज ने टैक्स हैवन कंट्रीज में पैसा इन्वेस्ट किया था। इन लोगों ने शैडो कंपनियां, ट्रस्ट और कॉर्पोरेशंस बनाए और इनके जरिए टैक्स बचाया था। 

लीक हुई लिस्ट खासतौर पर पनामा, ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड्स और बहामास में हुए इन्वेस्टमेंट्स के बारे में बताती है।

सवालों के घेरे में आए लोगों ने इन देशों में इन्वेस्टमेंट इसलिए किया, क्योंकि यहां टैक्स रूल्स काफी आसान हैं और क्लाइंट की आइडेंडिटी का खुलासा नहीं किया जाता।

पनामा में ऐसी 3.50 लाख से ज्यादा सीक्रेट इंटरनेशनल बिजनेस कंपनियां हैं।

 

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किसके डॉक्युमेंट्स लीक हुए, क्या है मोसेक?

ये डॉक्युमेंट्स मोसेक फोंसेका (Mossack Fonseca) के लीक हुए थे। यह लीगल फर्म है, जिसके 35 देशों में ऑफिस हैं। इन डॉक्युमेंट्स में 2 लाख 14 हजार अकाउंट्स का जिक्र था। ये करीब 40 साल से पनामा की बैंकों में हैं। 

1977 में बनी मोसेक फोंसेक का हेडक्वॉर्टर पनामा में है। यह दुनियाभर की कंपनियों या लोगों से मोटी फीस लेकर उन्हें फाइनेंशियल मैटर्स पर एडवाइज देती है। 

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, एडवाइज की आड़ में यह कंपनी ऑफशोर कंपनियां बना देती हैं। यानी आप फीस दीजिए और सीक्रेट और आसान टैक्स सिस्टम वाले देशों में कंपनियां बना लीजिए। यह लीगल फर्म लोगों की ऑफशोर कंपनियां बनाती हैं जो संबंधित देशों के टैक्स नियमों से तो चलती हैं लेकिन रियल ओनरशिप को छुपा देती हैं।

 


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सतीश कुमार वर्मा

लेखक न्यूज वर्ल्ड इंडिया में वेब जर्नलिस्ट हैं

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