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जयंती विशेष: क्रांति की चिंगारी भड़काने के लिए दुष्यंत की एक रचना काफी है!

अमितेष युवराज सिंह | न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 1
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| सितंबर 1 , 2018 , 18:50 IST

दुष्यंत कुमार, वो नाम जिसने हमेशा आम लोगों के लिए अपनी रचनाएं रचीं। जब भी ग़ज़लों की बात होती है उर्दू ज़ुबान की ही याद आती है लेकिन दुष्यंत कुमार ने हिंदी में ग़ज़लें लिखीं और उसे मुकाम तक भी पहुंचाया। उनकी ग़ज़लों में आम आदमी का दर्द नजर आता है। उनका जन्म 1 सितंबर 1933 को यूपी के बिजनौर जिले के राजापुर-नवादा में हुआ था। उनके बचपन का नाम दुष्यंत नारायण था। उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से एमए की उपाधि हासिल की थी। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी प्रयाग से ही हुई।

निदा फ़ाजली कहा करते थे कि दुष्यंत कुमार अपने जमाने के नए युवकों की आवाज़ हैं। दुष्यंत ने अपनी ग़ज़लों से क्रांति ला दी थी। उनकी रचनाएं वो संचार थीं जिन्होंने समाज के पिछड़े वर्गों को जागरुक किया। दुष्यंत ने 30 दिसंबर, 1975 को अंतिम सांस ली थी।

दुष्यंत कुमार के 10 मशहूर शेर...

 

'तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं,

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें य़कीन नहीं'

 

'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए'

 

'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,

ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं'

 

'जिंदगी जब अज़ाब होती है,

आशिक़ी कामयाब होती है'

 

'कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों'

 

'गूंगे निकल पड़े हैं ज़बां की तलाश में,

सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिये'

 

'तू किसी रेल सी गुजरती है,

मैं किसी पुल सा थरथराता हूं'

 

'रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया

इस बहकती हुई दुनिया को संभालों यारों'

 

'वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,

माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है'

 

'एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,

जिस में तह-ख़ानों से तह-ख़ाने लगे हैं'


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