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"धर्म और अहिंसा" ही है महावीर के मुख्य विचार (जयंती विशेष)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मार्च 29 , 2018 , 13:59 IST

आज पूरे देश में महावीर जयंती मनाई जा रही है। जैन धर्मावलंबियों के लिए यह बड़ा उत्सव होता है। महावीर को जैन धर्म का 24वां और अंतिम तीर्थांकर माना जाता है, जिन्होंने इस धर्म के प्रमुख सिद्धांतों का प्रतिपादन करने के साथ ही उन्हें व्यवस्थित रूप दिया।

अहिंसा, त्‍याग और तपस्‍या का संदेश देने वाले महावीर की जयंती ग्रीगोरियन कैलेंडर के अनुसार मार्च या अप्रैल महीने में मनाई जाती है।

जैन धर्म में दो समप्रदाय हैं- दिगम्बर और श्वेताम्बर। दिगम्बर मुनि वस्त्र नहीं पहनते है। नग्न रहते हैं, जबकि श्वेताम्बर सन्यासी सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं। जैन धर्म में अहिंसा और जीव दया पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। सभी जैन शाकाहारी होते हैं।

कौन हैं भगवान महावीर?

भगवान महावीर स्वामी का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व) राजा सिद्धार्थ के यहां कुंडग्राम में हुआ था जो वर्तमान में बिहार के मुजफ्फरपुर में आता है। माता का नाम त्रिशाला जिसे प्रियकारीनी भी कहते हैं।

30 वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गए।

12 वर्षो की कठिन तपस्या के बाद भगवान महावीर को ज्ञान प्राप्त हुआ और 72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी बने जिसमें उस समय के प्रमुख राजा बिम्बिसार, कुनिक और चेटक भी शामिल थे।

कैसे मनाई जाती है महावीर जयंती?

महावीर जयंती के दिन जैन मंदिरों में महावीर की मूर्तियों का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद मूर्ति को एक रथ पर बिठाकर जुलूस निकाला जाता है। इस यात्रा में जैन धर्म के अनुयायी बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

भगवान महावीर के विचार

1: किसी के अस्तित्व को मत मिटाओ, शांतिपूर्वक जियो और दूसरों को भी जीने दो।

2: अहिंसा परमो धर्म अर्थात अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। शांति और आत्म-नियंत्रण ही सही मायने में अहिंसा है।

3: आपने कभी किसी का भला किया हो तो उसे भूल जाओ और कभी किसी ने आपका बुरा किया हो तो उसे भी भूल जाओ।

4: हर जीवित प्राणी के प्रति दयाभाव ही अहिंसा है घृणा से मनुष्य का विनाश होता है। सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान अहिंसा है।

5: सभी मनुष्य अपने स्वयं के दोष की वजह से दुखी होते हैं, और वे खुद अपनी गलती सुधार कर सुखी हो सकते हैं।

6: आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत। खुद पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है। स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना? वह जो स्वयम पर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी।

7: प्रत्येक आत्मा स्वयं में सर्वज्ञ और आनंदमय है। आनंद बाहर से नहीं आता आत्मा अकेले आती है अकेले चली जाती है, न कोई उसका साथ देता है न कोई उसका मित्र बनता है। किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती अपने असल रूप को ना पहचानना है, और यह केवल आत्म ज्ञान प्राप्त कर के ठीक की जा सकती है।

8: भगवान् का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है। हर कोई सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास कर के देवत्त्व प्राप्त कर सकता है। प्रत्येक जीव स्वतंत्र है, कोई किसी और पर निर्भर नहीं करता आपात स्थिति में मन को डगमगाना नहीं चाहिये।

9: 'धम्मो मंगल मुक्किट्ठं. अहिंसा संजमो तवो' अर्थात धर्म उत्कृष्ट मंगल है। वह अहिंसा, संयम, तप रूप है। एक धर्म ही रक्षा करने वाला है। धर्म के सिवाय संसार में कोई भी मनुष्य का रक्षक नहीं है।

10: 'एगा धम्म पडिमा, जं से आया पवज्जवजाए' अर्थात धर्म एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान है जिससे आत्मा का शुद्धिकरण होता है। मनुष्य को अपने जीवन में जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है।


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