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RBI पर टिकी निगाहें, क्या क्रेडिट पॉलिसी में घटेंगी ब्याज दरें?

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| फरवरी 7 , 2017 , 04:10 IST

रिजर्व बैंक 8 फरवरी को मौद्रिक नीति की समीक्षा पेश करेगा। ऐसे में लोगों के जेहन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। क्या आरबीआई ब्याज दरों में कटौती करेगा, और अगर कटौती करेगा तो कितना? इन सवालों को लेकर जानकारों की अलग-अलग राय है। कुछ जानकारों का मानना है कि रिजर्व बैंक ब्याज़ दरों में कटौती नहीं करेगा। वहीं कई लोग मान रहे हैं कि आरबीआई 0.25 फ़ीसदी दरें घटा सकता है। 

रिजर्व बैंक कई चीजों को ध्यान में रखते हुए पॉलिसी बनाता है। जैसे महंगाई दर, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत, डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत और वित्तीय घाटे पर आरबीआई की नज़र होती है। इतना ही नहीं अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक का भी रिजर्ब बैंक की पॉलिसी पर असर होता है।

रिजर्व बैंक के सामने समस्या:

-फेडरल बैंक द्वारा ब्याज़ दरों में इज़ाफ़ा आरबीआई की सबसे बड़ी चिंता है।

-अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार इज़ाफ़ा।

-डॉलर के मुकाबल रुपया कमज़ोर हो रहा है।

-वित्तीय घाटे पर कोई खास नियंत्रण नहीं।

-विदेशी निवेश में कमी, विदेशी निवेशकों का भारत से मोहभंग।

-व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं।

-साथ ही डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीति की वज़ह से वैश्विक स्तर पर वाणिज्य और व्यापर जगत में उथल-पुथल।

पॉलिसी बनाते वक्त ये तमाम कराण आरबीआई को जरूर परेशान करेंगे। हालांकि मौजूदा समय में देश में महंगाई दर कंट्रोल में है, जो रिजर्व बैंक के लिए एक राहत की बात है। ऐसे में उद्योग जगत के साथ-साथ आम लोग आस लगाए हैं कि रिजर्व बैंक राहत जरूर देगा।

ब्याज़ दरों में कटौती के कारण:

-महंगाई दर पर कंट्रोल, खासकर खाद्य महंगाई दर नियंत्रण में है।

-नोटबंदी से परेशान आम लोगों पर मरहम लगाने की कोशिश।

-नोटबंदी के बाद बैंकों के पास भारी मात्रा में नकदी पहुंचना।

-खस्ता हाल उद्योग जगत को उठाने की कोशिश।

-बैंक और उद्योग जगत की रेपो दर में कटौती की मांग।

-ब्याज़ दरों में कटौती के लिए रिजर्ब बैंक पर सरकार का दबाव भी होगा।

एसोचैम (ASSOCHAM) की मांग:

एसोचैम का कहना है कि रिजर्व बैंक को कर्ज की वृद्धि सुस्त रहने और कमजोर मांग के बीच ब्याज दरों में 0.5 से 0.75 प्रतिशत की कटौती करनी चाहिए। साथ ही बैंकों से इसका लाभ ग्राहकों को स्थानांतरित करने को भी कहा जाए क्योंकि नोटबंदी की वजह से उन्हें ‘अप्रत्याशित लाभ’ हुआ है। एसोचैम ने कहा कि उद्योग ब्याज दरों में 0.50 से 0.75 प्रतिशत कटौती की उम्मीद कर रहा है और बैंकों को इसका पूरा लाभ उपभोक्ताओं को स्थानांतरित करना चाहिए। उद्योग मंडल ने कहा कि नोटबंदी की वजह से बैंकों को चालू खाते-बचत खाते (CASA) में सस्ते कोष के रूप में अप्रत्याशित लाभ हुआ है।

रेपो रेट में कटौती से फ़ायदा:

-रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में कटौती से बैंकों पर ब्याज़ दर घटाने का दबाव बढ़ेगा।

-बैंकों के ब्याज़ दर घटाने पर होम लोन सस्ता होगा।

-रियल स्टेट सेक्टर में बूम आ सकता है।

-कार और पर्सनल लोन भी सस्ता होगा।

-औद्योगिक इकाइयों को सस्ते दर पर लोन मुहैया होगा।  

-छोटे और मंझौले उद्योगों को बल मिलेगा।

-स्टील और पावर सेक्टर में तेज़ी आ सकती है।

-बैंकों को भी ब्याज़ दरों में कटौती करने में आसानी होगी।

-सबसे बड़ी बात नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा अरबों रुपए बाज़ार में आएगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

इन तमाम आशंकाओं की बीच अब लोगों की निगाहें रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल पर टिकी हैं। क्या उर्जित पटेल नीतिगत दरों में कटौती कर अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश करेंगे या फिर संरक्षणवादी नीतियों का अनुकरण करते हुए ब्याज़ दरों में कोई बदलाव नहीं करेंगे।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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