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इस घटना ने 12 साल की उम्र में भगत सिंह की ज़िन्दगी बदल दी (शहीद-ए-आजम विशेष)

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| सितंबर 28 , 2017 , 05:37 IST

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले (अब पाकिस्‍तान) के एक सिख परिवार में हुआ था। हालांकि उनके जन्‍म की तारीख पर कुछ विरोधाभास की स्थिति है। कुछ जगहों पर 27 सितंबर को उनके जन्‍मदिन का जिक्र मिलता है। उनके परिवार को देशभक्‍त होने के कारण ब्रिटिश राज के उस दौर में बागी माना जाता था।जब कभी भी हम उन शहीदों के बारे में सोचते है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दी तब हम बड़े गर्व से भगत सिंह का नाम ले सकते है।

आज भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह जी की 109वीं जयंती है। अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को अपने अदम्य साहस से झकझोर देने वाले शहीदे आजम भगत सिंह को जेल प्रशासन ने फांसी देने से पहले वाहे गुरू का ध्यान करने की सलाह दी तो उनके शब्द थे अब आखिरी वक्त भगवान को क्या याद करना, जिन्दगी भर तो मैं नास्तिक रहा, अब भगवान को याद करूंगा तो लोग कहेंगे मैं बुजदिल और बेईमान था और आखिरी वक्त मौत को सामने देखकर मेरे पैर लडख़ड़ाने लगे।

अंग्रेजों के चूल्हे हिला देने वाले शहीदे आजम भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान के ग्राम चक 105 जिला लायलपुर में 28 सितम्बर 1907 को हुआ था। उनके जन्म उनके पिता और दो चाचा, अजित सिंह और स्वर्ण सिंह जेल में थे, जिनको रिहा करने की बात चल रही थी। तो नन्हें भगत सिंह को बचपन से ही अपने घर में देशभक्ति का माहौल मिला।



अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। हालांकि इस समय भगत सिंह की उम्र केवल 12 साल थी। इस हत्याकांड की खबर मिलते हीं वे अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए थे, वे 14 वर्ष की आयु से ही क्रान्तिकारी समूहों से जुड़ने लगे।

1923 में उन्‍होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया। इस कॉलेज की शुरुआत लाला लाजपत राय ने की थी। कॉलेज के दिनों में उन्‍होंने एक्‍टर के रूप में कई नाटकों मसलन राणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्‍त और भारत दुर्दशा में हिस्‍सा लिया। उसी दौरान उन्‍होंने पंजाब हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता भी जीती। उस प्रतियोगिता में पंजाब की समस्‍याओं पर लिखने को कहा गया था।

महात्‍मा गांधी ने जब 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन को खत्‍म करने की घोषणा की तो भगत सिंह का अहिंसावादी विचारधारा से मोहभंग हो गया। उन्‍होंने 1926 में देश की आजादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्‍थापना की। चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिंदुस्‍तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जड़े। इसके बाद इस संगठन का नाम हिंदुस्‍तान सोशलिस्‍ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हो गया।

असहयोग आंदोलन समाप्‍त होने के बाद जब हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे तो उनको गहरी निराशा हुई। उसी दौर में उन्‍होंने अपने धार्मिक विश्‍वासों को त्‍याग दिया और वह यह मानने लगे कि आजादी के लिए क्रांतिकारी संघर्ष में धर्म एक बाधा है। उन्‍होंने बाकुनिन, लेनिन, ट्रॉटस्‍की जैसे नास्तिक क्रांतिकारियों के विचारों का गहरा अध्‍ययन शुरू किया। 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में उन्‍होंने अपना प्रसिद्ध निबंध ''मैं नास्तिक क्‍यों हूं'' (व्‍हाई एम एन एथीस्‍ट) लिखा।

परिजनों ने जब उनकी शादी करनी चाही तो वह घर छोड़कर कानपुर भाग गए। अपने पीछे जो खत छोड़ गए उसमें उन्‍होंने लिखा कि उन्‍होंने अपना जीवन देश को आजाद कराने के महान काम के लिए समर्पित कर दिया है। इसलिए कोई दुनियावी इच्‍छा या ऐशो-आराम उनको अब आकर्षित नहीं कर सकता।

वीर सेनानी भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है।

आजादी के इस मतवाले ने पहले लाहौर में 'सांडर्स-वध' और उसके बाद दिल्ली की सेंट्रल असेम्बली में चंद्रशेखर आजाद और पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट कर ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलंदी दी।

भगत सिंह ने इन सभी कार्यो के लिए वीर सावरकर के क्रांतिदल 'अभिनव भारत' की भी सहायता ली और इसी दल से बम बनाने के गुर सीखे। वीर स्वतंत्रता सेनानी ने अपने दो अन्य साथियों-सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर काकोरी कांड को अंजाम दिया, जिसने अंग्रेजों के दिल में भगत सिह के नाम का खौफ पैदा कर दिया।

भगत सिंह को पूंजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसंद नहीं आती थी। 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल पेश हुआ। अंग्रेजी हुकूमत को अपनी आवाज सुनाने और अंग्रेजों की नीतियों के प्रति विरोध प्रदर्शन के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फोड़कर अपनी बात सरकार के सामने रखी। दोनों चाहते तो भाग सकते थे, लेकिन भारत के निडर पुत्रों ने हंसत-हंसते आत्मसमर्पण कर दिया।

दो साल तक जेल में रहने के बाद उनको राजगुरू और सुखदेव के साथ फांसी की सजा हुई और 24 मई 1931 को फांसी देने की तारीख नियत हुई। लेकिन नियत तारीख से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को उनको शाम साढ़े सात बजे फांसी दे दी गई। कहा जाता है कि जब उनको फांसी दी गई तब वहां कोई मजिस्‍ट्रेट मौजूद नहीं था जबकि नियमों के मुताबिक ऐसा होना चाहिए था।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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