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धारा 377: वैध हथियार या 'प्रेम' के साथ एक कानूनी अत्याचार

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जनवरी 8 , 2018 , 20:10 IST

धारा 377 से जुड़ा विवाद तो ऐसा है जिस पर अभी चर्चा तक शुरू ही नहीं हुई है। इससे पहले ही यह धारा आज ऐसे बहस को जन्म दे चुकी है जिसके संवैधानिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक पहलू भी हैं। इन पहलुओं को टटोलने से पहले जानते हैं कि आखिर धारा 377 है क्या? भारतीय दंड संहिता की धारा 377 प्रकृति-विरुद्ध अपराध को परिभाषित करते हुए कहती है कि ‘जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीव-जंतु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छा से इंद्रिय-भोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा।

इसी धारा में आगे एक स्पष्टीकरण भी है जो कहता है कि ‘इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इंद्रिय भोग करने के लिए प्रवेशन(पेनिट्रेशन) पर्याप्त है।

 

धारा 377 की विसंगतियां

अप्राकृतिक सम्बन्ध केवल दो पुरुष या दो स्त्रियों में होना ही अपराध नहीं बल्कि एक पुरुष और स्त्री के बीच में होना भी हो सकता है। एक ताज़ातरीन उदाहरण है इसके लिए। दिल्ली की एक नवविवाहित महिला ने अपने पति पर आरोप लगाया है कि उनके हनीमून के दौरान उसके साथ बलात्कार किया गया और अप्राकृतिक तौर से सम्बन्ध बनाये गए। कोर्ट में रेप की दलील कमज़ोर पड़ जायेगी क्योंकि विवाहित महिला पर पति द्वारा बलात्कार किये जाने के बारे में तो नए कानून में भी कोई प्रावधान नहीं। लेकिन अप्राकृतिक तौर पर जो सम्बन्ध बनाये गए, ये शायद महिला को इन्साफ दिला पाये। ये उसकी मेडिकल रिपोर्ट में भी साबित हो गया है।

उच्च न्यायालय में नाज फाउंडेशन की ओर से धारा 377 की वैधानिकता को चुनौती दी गई है। इसी संस्था से संबद्ध एक अधिकारी अमृतानंद चक्रवर्ती ने कहा, 'पिछले साल हमने 6-7 मामले देखे जिनमें एक साझेदार अगर ब्लैकमेल वाली मांग नहीं पूरी करता है तब दूसरा व्यक्ति धारा 377 लगा देता है। इसका कोई कानूनी उपाय नहीं है क्योंकि अगर यह सहमति से भी किया जाता है तब भी यह एक अपराध है, ऐसे में आप अनिवार्य रूप से इसमें फंस जाते हैं।' हाल के मामले में समस्या कानून के इस्तेमाल में है, न कि इसके गलत इस्तेमाल में।

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आम तौर पर यौन अपराध तभी अपराध माने जाते हैं जब वे किसी की सहमति के बिना किए जाएं। लेकिन धारा 377 में कहीं भी सहमति का जिक्र नहीं है। इस कारण यह धारा समलैंगिक पुरुषों के सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को भी अपराध की श्रेणी में पहुंचा देती है।

इस धारा के विवादस्पद होने का मुख्य कारण भी यही है। 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस धारा को उस हद तक समाप्त कर दिया था, जहां तक यह सहमति से बनाए गए संबंधों पर रोक लगाती थी। लेकिन दिसंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे दोबारा से इसके मूल स्वरुप में पहुंचा दिया है।

धारा 377 के तहत सहमति से किया गया सेक्स भी अपराघ

उच्च न्यायालय में नाज फाउंडेशन की ओर से धारा 377 की वैधानिकता को चुनौती दी। इसी संस्था से संबद्ध एक अधिकारी अमृतानंद चक्रवर्ती ने कहा, 'पिछले साल हमने 6-7 मामले देखे जिनमें एक साझेदार अगर ब्लैकमेल वाली मांग नहीं पूरी करता है तब दूसरा व्यक्ति धारा 377 लगा देता है। इसका कोई कानूनी उपाय नहीं है क्योंकि अगर यह सहमति से भी किया जाता है तब भी यह एक अपराध है, ऐसे में आप अनिवार्य रूप से इसमें फंस जाते हैं।' हाल के मामले में समस्या कानून के इस्तेमाल में है, न कि इसके गलत इस्तेमाल में। 

यौन इच्छा इंसान और जानवरों में बराबर होती है

यौन इच्छा हर व्यक्ति में होती है। वह उतनी ही किन्नरों में भी होती है जितनी किसी स्त्री या पुरुष में। लोग उन्हें जानते-समझते नहीं तो यह मान लेते हैं कि उनमें शायद इच्छा ही नहीं होती होगी। कई लोगों में यह भ्रम होता है कि किन्नर अन्य लोगों की तरह यौन संबंध नहीं बना सकते तो शायद उन्हें इसकी जरूरत भी महसूस नहीं होती होगी।

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धारा 377 की एक दिलचस्प बात यह भी है कि यह हर तरह के समलैंगिकों पर रोक नहीं लगाती। वकील अरविंद नारायण बताते हैं, ‘धारा 377 में विशेष तौर पर यह स्पष्टीकरण लिखा गया है कि ‘इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इंद्रिय भोग करने के लिए प्रवेशन(पेनिट्रेशन) पर्याप्त है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि महिला समलैंगिकों के लिए यह संभव ही नहीं है। लिहाजा उनको धारा 377 के अंतरगत दंडित नहीं किया जा सकता। हालांकि ऐसे भी कुछ मामले हुए हैं जब समलैंगिक महिलाओं पर भी इस धारा का उपयोग किया गया है। लेकिन एलजीबीटी कार्यकर्ता और कानून के जानकार इसे 377 का दुरुपयोग ही बताते हैं।

धारा 377 में कहीं नहीं लिखा है कि समलैंगिक होना अपराध है। सिर्फ अप्राकृतिक सम्बन्ध बनाना ही आपको दोषी बनाता है। ये कैसे साबित होगा कि ऐसा कोई सम्बन्ध बनाया गया। या तो कोई किसी को रंगे हाथ पकड़े या 2 सम्बन्ध बनाने वालों में से कोई एक जाकर ज़बरदस्ती की शिकायत करे।

क्या पुलिस हर किसी के बेडरुम में छापे मारेगी

क्या ऐसा आपको लगता है कि पुलिस हर किसी के घर जाकर छापे मारेगी? ऐसा हो तो बलात्कार ही रुक जाए इस देश में या किसी भी देश में। बिना वारंट के तो पुलिस किसी के भी घर रेड नहीं कर सकती। और अगर एक पार्टनर जाकर शिकायत करता है कि ऐसा कुछ हुआ है तो फिर तो इस कानून का गलत प्रयोग उसी तरह हो सकता है जैसे कि हमारे नए बलात्कार विरोधी कानून का ।

 

 

 


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