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एससी-एसटी कानून में होगा बदलाव, कैबिनेट ने संशोधन को दी मंजूरी

icon सतीश कुमार वर्मा | 0
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| अगस्त 1 , 2018 , 20:09 IST

केंद्रीय कैबिनेट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दे दी है। जिसके बाद मोदी सरकार संशोधित बिल को मौजूदा संसद सत्र में ही पेश करेगी। 

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दिए जाने पर एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान ने खुशी जताते हुए ट्विटर पर जानकारी दी, उन्होने लिखा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून- 1989 में महत्वपूर्ण बदलाव कर उसे सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च 2018 के फैसले से पहले की स्थिति को बहाल किया जाएगा। उन्होने आगे लिखा कि CRPC की धारा 438 अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून पर लागू नहीं होगी। इस संबंध में संसद के चालू सत्र में बिल लाकर उसे पास कराया जाएगा

उन्होने एक और ट्वीट में लिखा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के केस में FIR दर्ज करने से पहले कोई प्रारंभिक जांच की जरूरत नहीं होगी, और अभियुक्तt की गिरफ्तारी करने के लिए कोई पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं होगी।

लोक जनशक्ति पार्टी ने किया था विरोध

बता दें कि मसले पर एनडीए के सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के साथ दलित संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था। पासवान ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार की दलित विरोधी छवि बनने का दावा किया था, जिसके बाद अब मोदी सरकार ने बिल में संशोधन का फैसला किया है।

सिर्फ इतना ही नहीं, हाल में जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस ए के गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया तो एलजेपी ने इसका पुरजोर विरोध किया। दरअसल, एके गोयल ने ही सुप्रीम कोर्ट में रहते हुए एससी/एसटी एक्ट के कुछ प्रावधानों को निरस्त करने का आदेश दिया था, जिसके चलते रामविलास पासवान की पार्टी समेत दूसरे संगठनों ने इस नियुक्ति का विरोध किया।

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दराअसल सुप्रीम कोर्ट ने हाल में फैसला सुनाते हुए एससी- एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि पहले आरोपों की डीएसपी स्तर का अधिकारी जांच करेगा, और यदि आरोप सही पाएजाते हैं तभी आगे की कार्रवाई होगी। सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद कई जगह पर विरोध-प्रदर्शन भी हुए थे।

बता दें कि देशभर में ऐसे कई मामले सामने आई जिसमें इस अधिनियम के दुरूपयोग हुआ है। बता दें कि एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 मामलों की शिकायतें सामने आई थी. इनमें से दर्ज हुईं शिकायतों में से 935 झूठी पाई गईं।


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सतीश कुमार वर्मा

लेखक न्यूज वर्ल्ड इंडिया में वेब जर्नलिस्ट हैं

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