ख़ास रिपोर्ट

शाहबानो की रूह आज बहुत खुश होगी, पीएम मोदी को दुआएं दे रही होगी...

icon कुलदीप सिंह | 1
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| दिसंबर 28 , 2017 , 20:49 IST

लोकसभा में मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ी राहत देने वाला ट्रिपल तलाक बिल पास हो गया लेकिन क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले ट्रिपल तलाक को खत्म करने की लड़ाई शुरू कहां से हुई थी। 

इंदौर की शाहबानो ने की थी पहल

इंदौर की रहने वाली शाहबानो पहली महिला थी, जिसने तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लड़कर जीत हासिल की थी। लेकिन तात्कालीन राजीव गांधी सरकार के एक फैसले ने उन्हें उनके हक से दूर कर दिया था।

दिलचस्प है शाहबानों की स्टोरी 

साल 1978 में इंदौर की रहने वाली पांच बच्चों की मां 62 साल की शाहबानो को उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने तलाक दे दिया था। मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार, पति पत्नी की मर्ज़ी के खिलाफ़ ऐसा कर सकता है, लेकिन बच्चों और खुद के भरण-पोषण के लिए शाहबानो ने तलाक के खिलाफ आवाज उठाई और हक मांगने अदालत जा पहुचीं। सुप्रीम कोर्ट ने ७ साल तक चले केस के बाद फैसला शाहबानो के पक्ष में सुनाया। कोर्ट ने पति को शाहबानो को भरण-पोषण के लिए भत्ता देने का आदेश दिया।

 की शाहबानोंने शुरू की थी ट्रिपल तलाक के खिलाफ लड़ाई

राजीव गांधी की वजह से मुस्लिम महिलाओं को नहीं मिला था हक़ 
शाहबानो के पक्ष में आए इस फैसले का मुस्लिम समाज ने विरोध शुरू कर दिया। विरोध स्वरूप ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड नाम की एक संस्था बनाई और सरकार को देशभर में उग्र आंदोलन की धमकी दी। इनकी धमकी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मानते हुए एक साल के भीतर सुप्रीम कोर्ट के धर्मनिरपेक्ष निर्णय को उलटने वाले, मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 को पास करा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इस कानून के बाद शाहबानो को उसका हक नहीं मिल पाया। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्ज़ी ने अपनी किताब 'दि टर्बुलेंट ईयर्स :1980-1996' में शाहबानो प्रकरण का जिक्र किया है। उन्होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस फैसले को बड़ी गलती बताया है। किताब में उन्होंने लिखा है कि इस मामले में राजीव के फैसले से उनकी आधुनिक छवि पर गहरा धक्का लगा था।

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ऐसे पलटा गया था सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 

१९८६ में कांग्रेस पार्टी ने जिसे संसद में पूर्ण बहुमत प्राप्त था, एक कानून पास किया जिसने शाह बानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया। इस कानून के अनुसार:

"हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता १९७३ की धारा १२५ के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो"

क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, उच्चतम न्यायालय के धर्म-निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला, मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून १९८६ आसानी से पास हो गया।

1992 में हुई शाहबानो की मौत 

ट्रिपल तलाक के खिलाफ जंग छेड़ने वाली शाहबानों की मौत ब्रेन हेमरेज से साल 1992 में हुई। शाहबानो के पति मोहम्मद अहमद खान ने शादी के 14 साल एक कम उम्र की लड़की से शादी कर ली थी और शाहबानो के साथ वो इंदौर में नई बीवी के साथ रहने लगा, कुछ दिनों बाद मोहम्मद अहमद खान ने शाहबानों को 5 बच्चों के साथ घर से निकाल दिया और 200 रुपए गुजारा भत्ता देने से भी मना कर दिया। इसी अन्याय के खिलाफ शाहबानो ने इंसाफ की लड़ाई शुरू की थी जिसे दूसरी पीड़ित मुस्लिम महिलाओं ने अंजाम तक पहुंचा दिया। 


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कुलदीप सिंह

Executive Editor - News World India. Follow me on twitter - @KuldeepSingBais

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