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शहीद दिवस: 'ज़िंदगी तो अपने दम पर जी जाती हैं, दूसरों के कंधों पर तो जनाजे उठा करते हैं'

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मार्च 23 , 2018 , 13:37 IST

देश की आजादी के लिए अपनी जान की बाजी लगने वाले अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को 23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। इस अवसर पर आज पीएम मोदी ने भी ट्वीट कर शहीदों को याद किया। उन्होंने लिखा कि देश उनके बलिदान और साहस को कभी नहीं भूल सकता।

शहीद दिवस के मौके पर आज हम आपको देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे को चूमने वाले भारत मां के उन तीन वीर सपूतों के बारे में जानकारी दे रहे हैं....

भगत सिंह

भगत सिंह का जन्म पंजाब प्रांत के लायलपुर में सिख परिवार में 28 सितंबर 1907 को हुआ था। भगत सिंह भारतीय इतिहास के बड़े स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में शामिल हैं। आजादी के प्रति दीवानगी इन्हें बचपन से ही मिली थी। इनके पिता गदर पार्टी के थे और वे स्वयं भी एक स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे। पंजाबी पृष्ठभूमि का होने के कारण ये साहसिक भी थे, यूं तो इनके जीवन पर गांधीवादी विचारों का प्रभाव था लेकिन बाद में इन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी एचआरए से जुड़कर क्रांति की नई शुरूआत की। वे 14 वर्ष की आयु से ही क्रांतिकारी दलों के लिए कार्य करने लगे थे। इंटरमीडिएट करने के बाद वे लाहौर पहुंचे, तो कानपुर जाने का अवसर मिला तब वे गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, वहां उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन करने का अवसर मिला, उन्होने कानपुर के अखबार प्रताप में बलवंत सिंह के नाम से और दिल्ली में अर्जुन के संपादकीय विभाग में अर्जुन सिंह के नाम से कार्य किया, उनका संबंध नौजवान भारत सभा से भी रहा।

शिवराम हरि राजगुरू

शिवराम हरि राजगुरू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी थे। शिवराम हरि राजगुरू का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को पुणे के खेडा में हुआ था, बड़ी छोटी आयु में ही ये वाराणसी पहुंच गए और संस्कृत का अध्ययन किया, वाराणसी में राजगुरू की भेंट कई क्रांतिकारियों से हुई, वे चंद्रशेखर आज़ाद से बेहद प्रभावित थे, बाद में वे उनसे जुड़े और सांडर्स मर्डर में उन्होंने अपनी भागीदारी की, वे भगतसिंह और सुखदेव के साथ थे। 

सुखदेव

सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। उन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए बेहतरीन कार्य किया। उनके मन में बचपन से ही स्वाधीनता का सपना था। पंजाब के लायलपुर में श्री रामलाल थापर और श्रीमती रल्ली देवी के घर उनका जन्म हुआ। उनके ताउ ने उनके पिता की मृत्यु के बाद उनका पालन किया। उन्होंने सांडर्स मर्डर में राजगुरू का साथ दिया। 


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