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शहनाई को ही अपनी बेगम मानते थे उस्ताद बिस्मिल्‍लाह ख़ान (पुण्यतिथि विशेष)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 1
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| अगस्त 21 , 2018 , 09:35 IST

पूरी दुनिया में शहनाई को लोकप्रिय बनाने वाले भारतरत्‍न उस्‍ताद बिस्मिल्लाह खान किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। शहनाई वादन में उन्होंने देश को दुनिया में एक अलग मुकाम दिलाया। अपनी शहनाई से सबके दिलों में मिठास घोलने वाले मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की मंगलवार को पुण्यतिथि है। बिस्मिल्लाह खान ने भारतीय संगीत को एक नई दिशा प्रदान की थी। संगीत-सुर और नमाज़ इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह ख़ां की जिंदगी में और दूसरा कुछ न था।

कौन थे उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान

उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान का जन्‍म बिहार के डुमरांव में 21 मार्च 1916 को एक मुस्लिम परिवार में पैगम्बर खां और मिट्ठन बाई के यहां हुआ था। उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा हुआ है। उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए 'बिस्मिल्ला' कहा। इसके बाद उनका नाम 'बिस्मिल्ला' ही रख दिया गया। उनका एक और नाम 'कमरूद्दीन' था।

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उनके पूर्वज बिहार के भोजपुर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार थे। उनके पिता पैंगबर ख़ाँ इसी प्रथा से जुड़ते हुए डुमराव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादन का काम करने लगे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्ला को बनारस ले जाया गया। यहाँ उनका संगीत प्रशिक्षण भी शुरू हुआ और गंगा के साथ उनका जुड़ाव भी। ख़ाँ साहब 'काशी विश्वनाथ मंदिर' से जुड़े अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई वादन सीखने लगे।

...ऐसा दौड़ जहां गाने-बजाने को सम्मान से नही देखा

एक ऐसे दौर में जबकि गाने-बजाने को सम्‍मान की निगाह से नहीं देखा जाता था, तब बिस्मिल्ला ख़ां ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों में अपनी तपस्या और रियाज़ से ख़ूब संवारा और क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया। बहुत ही कम लोग जानते हैं कि ख़ां साहब की मां कभी नहीं चाहती थी उनका बेटा शहनाई वादक बने। वे इसे एक हल्‍का काम समझती थी कि क्‍योंकि शहनाईवादकों उसे समय शादी ब्‍याह और अन्‍य समारोह में बुलाया जाता था।

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भारत की आजादी और बिस्मिल्लाह की शहनाई

भारत की आजादी और बिस्मिल्लाह की शहनाई के बीच भी बहुत गहरा रिश्ता है। 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहराया जा रहा था तब उनकी शहनाई भी वहां आजादी का संदेश बांट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्ला का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।

खान ने देश और दुनिया के अलग अलग हिस्सों में अपनी शहनाई की गूंज से लोगों को मोहित किया। अपने जीवन काल में उन्होंने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस जैसे अलग-अलग मुल्कों में अपनी शहनाई की जादुई धुनें बिखेरीं।

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भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति की फिजा में शहनाई

भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति की फिजा में शहनाई के मधुर स्वर घोलने वाले प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्ला ख़ाँ शहनाई को अपनी बेगम कहते थे और संगीत उनके लिए उनका पूरा जीवन था। पत्नी के इंतकाल के बाद शहनाई ही उनकी बेगम और संगी-साथी दोनों थी, वहीं संगीत हमेशा ही उनका पूरा जीवन रहा। खान साहब शहनाई को ही अपनी बेगम मानते थे ।

उनके ऊपर लिखी एक किताब ‘सुर की बारादरी’ में लेखक यतीन्द्र मिश्र ने लिखा है- "ख़ाँ साहब कहते थे कि संगीत वह चीज है, जिसमें जात-पात कुछ नहीं है। संगीत किसी मजहब का बुरा नहीं चाहता।" किताब में मिश्र ने बनारस से बिस्मिल्लाह ख़ाँ के जुड़ाव के बारे में भी लिखा है। उन्होंने लिखा है कि- "ख़ाँ साहब कहते थे कि उनकी शहनाई बनारस का हिस्सा है। वह ज़िंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए हैं तो कहीं ना कहीं बनारस का रस उनकी शहनाई में टपकेगा ही।

शहनाई को शास्‍त्रीय संगीत की गलियों में प्रवेश

बिस्मिल्ला ख़ां ने शहनाई को मंदिरों, राजे-रजवाड़ों के मुख्य द्वारों और शादी-ब्याह के अवसर पर बजने वाले लोकवाद्य से निकालकर शास्‍त्रीय संगीत की गलियों में प्रवेश कराया। उस्‍ताद ने अपने मामा उस्ताद मरहूम अलीबख़्श के कहे मुताबिक शहनाई को 'शास्त्रीय संगीत' का वाद्य बनाने में जिंदगी भर जितनी मेहनत की उसकी कोई मिसाल नहीं है।

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उस्ताद ने कई जाने-माने संगीतकारों के साथ जुगलबंदी कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। उस्‍ताद ने अपनी शहनाई के स्‍वर विलायत ख़ां के सितार और पण्डित वी. जी. जोग के वायलिन के साथ जोड़ दिए और संगीत के इतिहास में स्‍वरों का नया इतिहास रच दिया। ख़ां साहब की शहनाई जुगलबंदी के एल. पी. रिकॉड्स ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि उस्‍ताद के इन्हीं जुगलबंदी के एलबम्स के आने के बाद जुगलबंदियों का दौर चला।

गंगा घाट से निकलकर दुनिया में शहनाई 

उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान की शहनाई की धुन बनारस के गंगा घाट से निकलकर दुनिया के कई देशों में बिखरती रही। उनकी शहनाई अफ़ग़ानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ़्रीका, अमेरिका, भूतपूर्व सोवियत संघ, जापान, हांगकांग और विश्व भर की लगभग सभी राजधानियों में गूंजती रही। उनकी शहनाई की गूंज से फिल्‍मी दुनिया भी अछूती नहीं रही। उन्होंने कन्नड़ फ़िल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, हिंदी फ़िल्म ‘गूंज उठी शहनाई’और सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘जलसाघर’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ी। आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फ़िल्म‘स्वदेश’ के गीत‘ये जो देश है तेरा’में शहनाई की मधुर तान बिखेरी।

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संगीत-सुर और नमाज़ इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह ख़ां की जिंदगी में और दूसरा कुछ न था। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, तानसेन पुरस्कार से सम्‍मानित उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान को साल 2001 में भारत के सर्वोच्‍च सम्‍मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान की आखिरी इच्‍छा

यकीनन उस्‍ताद के लिए जीवन का अर्थ केवल संगीत ही था। उनके लिए संगीत के अलावा सारे इनाम-इक़राम, सम्मान बेमानी थे। वे संगीत से देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते थे। वे कहते थे "सिर्फ़ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहज़ीब को एकाकार करने की ताक़त रखता है"।

इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्‍छा रखने वाले उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान की आखिरी इच्‍छा अधूरी ही रही और उन्‍होंने 21 अगस्‍त 2006 को इस दुनिया में अंतिम सांस ली और उस अंतिम सांस के साथ आत्‍मा को परमात्‍मा से जोड़ने वाली उनकी शहनाई की धुनें हमेशा के लिए खामोश हो गई।

कौन-कौन सा मिला अवॉर्ड

संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार: 1956
पद्मविभूषण: 1968
पद्म भूषण: 1980
तराल मौसकि: 1992
भारत रत्न: 2001


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