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'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी'...स्वतंत्रता संग्राम की पहली वीरांगना (जयंती विशेष)

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| नवंबर 19 , 2018 , 10:10 IST

कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम पर लिखी कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' सभी ने जरूर सुनी होगी। आज इसी वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का जन्म दिवस है। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी में 19 नवंबर 1835 को हुआ था। वे बचपन से ही प्रतिभा की धनी थीं। आज उनकी जंयती के मौके पर बनारस में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन होगा।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की संघर्ष गाथा उनके जन्म स्थान काशी से ही प्रारंभ होती है। भदैनी स्थित रानी लक्ष्मी बाई स्मारक स्थल पर वीरांगना लक्ष्मी बाई की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। इसमें वह घोड़े पर सवार, पीठ पर अपने बच्चे को बांधे और हाथ में तलवार लिए युद्ध की मुद्रा में हैं। स्मारक की दीवारों पर सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी... लिखी गई हैं।

यहीं से शुरू हुआ अंग्रेजों और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष। उन्होंने इसके लिए अपने बचपन के मित्र नाना साहेब पेशवा और तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों को झांसी से खदेड़ने का बीड़ा उठाया। चूंकि उस समय भारत रियासतों में बंटा था लिहाजा कई रियासतें अंग्रेजों को अपने राज्य से भगाने में लगी हुईं थीं। दिल्ली के आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की सदारत में आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका गया था।

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अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का नारा बुलंद करने वाली रानी लक्ष्मीबाई संभवत

भारतीय स्वंतत्रता संग्राम की पहली वीरांगना थी। लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से इन्हें मनु बुलाते थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई तथा पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे।

मनु जब चार वर्ष की थीं तब उनके मां की मृत्यु हो गई। घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए पिता ने उन्हें अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए। बाजीराव के दरबार में मनु ने अपने चंचल ओर सुंदर स्वभाव से सबका मन मोह लिया। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर लेकिन चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गई।

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सन 1853 में राजा गंगाधर राव की तबीयत बहुत ज्यादा खराब होने के कारण उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गई। पुत्र गोद लेने के बाद कुइ दिनों बाद ही राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। लोग उन्हें प्यार से 'छबीली' बुलाते। 1842 में इनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ, और ये झांसी की रानी बनीं।
1857 के सितंबर-अक्तूबर महीने में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया।1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ्तों की लडा़ई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया। हालांकि रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गई। रानी झांसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली।

तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मौत हो गई।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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