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यहां भगवान की नहीं उनकी पूजा होती है जो भगवान के नाम पर बोलते हैं: सर्वपल्ली राधाकृष्णन

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| सितंबर 5 , 2018 , 07:50 IST

गुरू ही हमारे जीवन को सार्थक करते हैं। ये ही हमें जीने का तरीका और उसमें आने वाली परेशानियों से लड़ने के बारे में बताते हैं। जीवन में सफल होने के लिए गुरु का मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है। हर साल 5 सितंबर का दिन शिक्षकों को समर्पित हैं। इस दिन देशभर में शिक्षक दिवस (Teacher's Day) मनाया जाता है। सभी छात्र-छात्राएं इस दिन अपने गुरु यानी शिक्षकों के प्रति प्यार व्यक्त करते हैं। लेकिन क्या आपको मालूम है कि शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का 5 सितंबर 1888 को जन्म हुआ था। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक दार्शनिक, विद्वान, शिक्षक और राजनेता भी थे। लेकिन देश में शिक्षा के लिए उनके समर्पित कार्य की वजह से उनके जन्मदिन को महत्वपूर्ण दिन बना दिया और शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। राधाकृष्णन के अनुकरणीय कार्यों के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले शिक्षको के योगदान को याद करते हैं और आभार व्यक्त करते है।

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जीवन परिचय

डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरूतनी ग्राम में, जो तत्कालीन मद्रास से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है, 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया वह एक ब्राह्मण परिवार था। उनका जन्म स्थान भी एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है।

राधाकृष्णन के पुरखे पहले कभी 'सर्वपल्ली' नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में उन्होंने तिरूतनी ग्राम की ओर निष्क्रमण किया था। लेकिन उनके पुरखे चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के ग्राम का बोध भी सदैव रहना चाहिये। इसी कारण उनके परिजन अपने नाम के पूर्व 'सर्वपल्ली' धारण करने लगे थे।

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डॉ॰ राधाकृष्णन एक ग़रीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की सन्तान थे। उनके पिता का नाम 'सर्वपल्ली वीरास्वामी' और माता का नाम 'सीताम्मा' था। उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। उन पर बहुत बड़े परिवार के भरण-पोषण का दायित्व था। वीरास्वामी के पाँच पुत्र तथा एक पुत्री थी। राधाकृष्णन का स्थान इन सन्ततियों में दूसरा था। उनके पिता काफ़ी कठिनाई के साथ परिवार का निर्वहन कर रहे थे। इस कारण बालक राधाकृष्णन को बचपन में कोई विशेष सुख प्राप्त नहीं हुआ।

1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह दूर के रिश्ते की बहन 'सिवाकामू' के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी। अतः तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना आरम्भ किया। यद्यपि उनकी पत्नी सिवाकामू ने परम्परागत रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उनका तेलुगु भाषा पर अच्छा अधिकार था। वह अंग्रेज़ी भाषा भी लिख-पढ़ सकती थीं।

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1908 में राधाकृष्णन दम्पति को सन्तान के रूप में पुत्री की प्राप्ति हुई। 1908 में ही उन्होंने कला स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और दर्शन शास्त्र में विशिष्ट योग्यता प्राप्त की। शादी के 6 वर्ष बाद ही 1909 में उन्होंने कला में स्नातकोत्तर परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली।

इनका विषय दर्शन शास्त्र ही रहा। उच्च अध्ययन के दौरान वह अपनी निजी आमदनी के लिये बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करते रहे। 1908 में उन्होंने एम० ए० की उपाधि प्राप्त करने के लिये एक शोध लेख भी लिखा। इस समय उनकी आयु मात्र बीस वर्ष की थी। इससे शास्त्रों के प्रति उनकी ज्ञान-पिपासा बढ़ी। शीघ्र ही उन्होंने वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन कर लिया।

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डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में कहा जाता है कि वो छात्रों के साथ भी दोस्तो की तरह पेश आते थे। वे छात्रो के बीच काफी लोकप्रिय थे।

राधाकृष्णन 1962 ये 1967 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि विश्वविद्यालयों का मुख्य काम डिग्री या डिप्लोमा बांटना नहीं है, बल्कि छात्रों में एडवांस लर्निंग की भावना पैदा करना है।

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डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कहना था कि राष्ट्र निमार्ण में शिक्षकों की एक बड़ी भूमिका है और इसके लिए शिक्षको को और सम्मान किया जाना चाहिए। एक विचारक और शिक्षक के अलावा वह एक दार्शनिक रहते हुए एक बार भगवत गीता पर एक पुस्तक लिखी जहां एक शिक्षको को परिभाषित किया।

जिसमें उन्होंने लिखा लिखा: " The one who emphasizes on presentation to converge different current of thoughts to the same end." ( वह जो प्रस्तुति पर जो देता है, विचारों के अलग-अलग धाराओं को एक ही अंत में परिवर्तित करता है)

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उनके विचार से शिक्षक एक अलग ही रूप है। उनके कुछ विचार हैं, वे कहते थें:

- यहां पूजा भगवान की नहीं बल्कि उनकी होती है जो भगवान के नाम पर बोलने का दावा करते हैं।
- अपने पड़ोसी को उतना प्यार करो जितना खुद को करते हो, क्योंकि तुम ही अपने पड़ोसी हो।

- शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे।

- पुस्तकें वह माध्यम हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकें।

- शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अतः विश्व को एक ही ईकाई मानकर शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए।

- शांति राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकती बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है।

- शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए, जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ लड़ सके।

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उनके कुछ मह्त्वपूर्ण कार्य काल

- सन् 1931 से 36 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे।

- ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में 1936 से 1952 तक प्राध्यापक रहे।

- कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया।

- सन् 1939 से 48 तक काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।

- 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।

- 1946 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

- 1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किये गये।

- 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा "सर" की उपाधि प्रदान की गयी थी।

- 1954 में उन्हें उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन हमारे बीच भले ही नही है लेकिन उनको हम आज भी याद करते है। वे हम सब के बीच 5 सितम्बर 1888 से 17 अप्रैल 1975 तक रहें।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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