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IL&FS में फंस सकते हैं 14 लाख कर्मचारियों के PF के हजारों करोड़ रुपये!

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| फरवरी 14 , 2019 , 13:16 IST

प्रोविडेंट और पेंशन फंड ट्रस्टों के IL&FS ग्रुप के बॉन्ड्स में 'हजारों करोड़ रुपयों' फंसे हैं। अब जब इन ट्रस्टों को अपने पैसे डूबने की आशंका सताने लगी तो इन्होंने नैशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) में हस्तक्षेप याचिकाएं (इंटरवीनिंग पिटिशंस) दाखिल कर दी हैं। चूंकि ये ट्रेडेड इंस्ट्रूमेंट्स हैं, इसलिए दांव पर लगी वास्तिवक रकम की जानकारी नहीं है। हालांकि, इन्वेस्टमेंट बैंकरों के मुताबिक यह रकम हजारों करोड़ में है क्योंकि रिटायरमेंट फंड्स AAA रेटिंग के कारण IL&FS के बॉन्ड्स पर लट्टू थे। दरअसल, रिटायरमेंट फंड्स कम जोखिम उठाकर कम ब्याज दर से ही सही, लेकिन निश्चित रिटर्न पर जोर देते हैं।

ट्वीट साभार- ET NOW

इन्होंने दिए आवेदन

सूत्रों के मुताबिक, एमएमटीसी, इंडियन ऑइल, सिडको, हुडको, इडबी, एसबीआई के साथ-साथ गुजरात और हिमाचल प्रदेश के इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड्स जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कर्मचारियों के रिटायरमेंट फंड्स मैनेज करने वाले ट्रस्ट्स एनसीएलटी में याचिका दाखिल करने वालों में शामिल हैं। इनके अलावा, हिंदुस्तान यूनिलिवर और एशियन पेंट्स जैसी प्राइवेट कंपनियों के पीएफ फंड्स भी IL&FS में फंसे हैं।

करीब 14 लाख कर्मचारी फंसे

फंडों ने एनसीएलटी को दिए आवेदनों में रेजॉलुशन प्रॉसेस पर ही सवाल खड़ा कर दिया। पीएफ फंडों के लिए 12 मार्च तक एनसीएलटी में आवेदन दिए जाने की मियाद है, इसलिए आवेदनों में वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। माना जा रहा है कि अब तक 14 लाख से ज्यादा कर्मचारियों के रिटायरमेंट फंड्स को मैनेज करने वाले 50 से ज्यादा ट्रस्टों के पैसे IL&FS में फंसे हैं। इस बारे में संपर्क करने पर IL&FS के प्रवक्ता शरद गोयल ने कहा कि कंपनी इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी।

चिंता की बड़ी वजह

दरअसल, चिंता का विषय यह है कि IL&FS ने अपनी ग्रुप कंपनियों को तीन वर्गों ग्रीन, ऐंबर और रेड में विभाजित कर दिया है। ग्रुप की कुल 302 कंपनियों में 169 भारतीय कंपनियां हैं। इनमें 22 ग्रीन, 10 ऐंबर और 38 कंपनियां रेड कैटिगरी में आती हैं जबकि शेष 99 भारतीय कंपनियों का वर्गीकरण करने के लिहाज से आकलन किया जा रहा है। अब यह जानना जरूरी है कि ग्रीन कैटिगरी की कंपनियों को अपने सारे दायित्वों का निर्वहन करना होगा। ऐंबर कैटिगरी की कंपनियां सिर्फ सिक्यॉर्ड क्रेडिटर्स के प्रति जिम्मेदार होंगी जबकि रेड कैटिगरी की कंपनियां अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर पाएंगी। अगर सिर्फ सिक्यॉर्ड क्रेडिटर्स को ही पेमेंट मिलना है तो सिर्फ बैंकों को ही उनका बकाया मिल पाएगा जबकि असुरक्षित निवेश करने वालों के हाथ खाली रह जाएंगे।


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