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जब महादेव मुग्ध होकर करने लगे भक्त की चाकरी, पढ़े पूरी कहानी

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 12 , 2018 , 20:01 IST

कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि देवों के देव महादेव एक भक्त पर इतना मुग्ध हो गए कि उसके घर जाकर चाकरी करने लगे और छोटी सी गलती पर उस भक्त की पत्नी के हाथों जलती लकड़ी से उन्हें पिटाई तक खानी पड़ी। यह घटना सन् 1360 के आसपास की है और वह भी उस धरती की, जहां द्वापर युग में सीता अवतरित हुई थीं। 

बिहार के मिथिला क्षेत्र के दरभंगा जिले में स्थित विस्फी गांव की प्रसिद्धि महाकवि विद्यापति के गांव के रूप में है। मैथिल कोकिल के नाम से चर्चित विद्यापति ठाकुर भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। एक कथा प्रचलित है कि उनकी भक्ति और रचनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव एक दिन नौकर के वेश में इनके घर पहुंचे और चाकरी करने का मौका देने की गुहार लगाई। शिव ने अपना नाम 'उगना' बताया। जैसे बालचंद्र अपभ्रंश में बालचन या बलचनमा हो जाता है, उसी तरह उग्रनाथ को लोग उगना कहते हैं।

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विद्यापति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उगना को बतौर नौकर अपने घर में रखने से मना कर दिया। लेकिन शिव मानने वाले कहां थे। पगार के बजाय सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने को तैयार हो गए। विद्यापति की पत्नी सुधीरा ने कहा, "उगना बड़ा नेक लड़का लगता है, रख लीजिए..हमारी सेवा करने वाला भी तो कोई नहीं है।" विद्यापति ने पत्नी की बात मान ली और शिव की इच्छा पूरी हो गई। 

एक दिन विद्यापति के साथ राजा शिव सिंह के दरबार में जा रहे थे। साथ में उगना भी था। तेज गर्मी की वजह से विद्यापति का गला सूखने लगा। आसपास पानी का कोई स्रोत नहीं था। व्याकुल विद्यापति ने उगना से कहा, "कहीं से जल का प्रबंध करो, अन्यथा मैं प्यासा ही मर जाऊंगा।" शिव कुछ दूर जाकर पेड़ों की आड़ में छिपकर अपने को वास्तविक रूप में ले आए। उनकी जटा में गंगा थीं। जटा खोलकर उन्होंने लोटे में जल भर लिया और फिर उगना रूप में विद्यापति के सामने पानी भरा लोटा रख दिया।

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विद्यापति ने जब जल पिया तो उन्हें गंगाजल का स्वाद महसूस हुआ। वह आश्चर्यचकित हो उठे कि इस वन में दूर तक कहीं जल का कोई स्रोत नहीं दिखता, लेकिन उगना को गंगाजल कहां मिल गया। विद्यापति को उगना पर संदेह होने लगा। उन्होंने सोचा, कोई साधारण व्यक्ति इतनी जल्दी गंगाजल नहीं ला सकता। इसमें जरूर कोई दिव्यशक्ति है। वह उगना से उसका वास्तविक परिचय बताने की जिद करने लगे। 

जब विद्यापति ने उगना को शिव कहकर उनके चरण पकड़ लिए, तब उगना को अपने वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा। शिव ने विद्यापति से कहा, "मैं तुम्हारे साथ उगना बनकर रहना चाहता हूं, लेकिन कभी किसी को मेरा वास्तविक परिचय मत देना। जिस दिन किसी को मेरा वास्तविक परिचय दोगे, मैं तत्क्षण ओझल हो जाऊंगा।" 

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विद्यापति को बिना मांगे संसार के ईश्वर का सान्निध्य मिल चुका था। उन्होंने शिव की शर्त मान ली।

एक दिन सुधीरा ने उगना को जंगल से लकड़ियां बीनकर लाने के लिए कहा। उगना दूसरे काम में लग गया और वह काम भूल गया। सुधीरा इससे नाराज हो गईं और चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर लगी उगना की पिटाई करने। विद्यापति ने जब यह ²श्य देखा तो अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा, "अरे, अहां ई की अनर्थ करै छी, ई त' साक्षात् भगवान शिव थिकाह!" विद्यापति के मुंह से ये शब्द निकलते ही शिव अंर्तध्यान हो गए।

इसके बाद विद्यापति पागलों की भांति 'उगना रे मोर कतय गेलाह' कहते हुए वनों में, खेतों में, हर जगह उगना को ढूंढने लगे। भक्त की ऐसी मनोदशा देखकर शिव को दया आ गई। एक वन में भगवान शिव उगना के रूप में प्रकट हो गए, मगर कहा कि 'अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। उगना रूप में मैं जो तुम्हारे साथ रहा उसके प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिव लिंग के रूप में विराजमान रहूंगा।' शिव की इस लीला से गौरी भी प्रसन्न हुईं। विद्यापति की एक रचना की पंक्ति है- "नंदन वन में भेटला महेश, गौरी मन हर्षित मेटल कलेश।"

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इसके बाद शिव अपने लोक लौट गए और उस स्थान पर शिवलिंग प्रकट हो गया। उगना महादेव का प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान में मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में स्थित है।

विद्यापति भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों मे से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरूप के दर्शन किए जा सकते हैं। इन्हें वैष्णव और शैव भक्ति के सेतु के रूप में भी स्वीकार किया गया है।

मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र देकर विद्यापति ने उत्तर बिहार में लोकभाषा के प्रति जनचेतना को जीवित करने का हरसंभव प्रयास किया। आज भी मिथिला पर महाकवि विद्यापति का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। उनकी नचारी, महेशवाणी, गंगा विनती, प्राती वगैरह मिथिला के लोगों के मन-मस्तिष्क में रच-बस गई हैं। 

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विद्यापति के जीवन के आठ सौ वर्ष बीतने के बावजूद वह आज भी मिथिला के लोगों के दिलों पर राज करते दिख रहे हैं। सुकवि कंठहार यानी विद्यापति तुलसी, सूर, कबीर, मीरा इन सभी से पहले के कवि हैं। इनका संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं मातृभाषा मैथिली पर समान अधिकार था।

विद्यापति की रचनाएं संस्कृत, अवहट्ट एवं मैथिली तीनों में मिलती हैं। देसिल बयना यानी मैथिली में लिखी 'पदावली' महाकवि को अमरत्व प्रदान करने के लिए काफी है। मैथिली साहित्य के इतिहास में विद्यापति का नाम स्वर्णाक्षर में अंकित है। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न इस महाकवि के व्यक्तित्व में एक साथ चिंतक, शास्त्रकार तथा साहित्य रसिक का अद्भुत समन्वय था।

विद्यापति को एक दिन अपनी मृत्यु का आभास हुआ, तो उन्होंने अपने मित्र राजा और गुरुओं को स्मरण करते हुए कहा, "सपन देखल हम शिव सिंह भूप/ बत्तीस बरस पर सांवर रूप/बहुत देखल गुरुजन प्राचीन/आब भेलहुं हम आयु विहीन।"

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महाकवि गंगा लाभ करना चाहते थे, लेकिन उम्र की अधिकता के कारण गंगा तक पहुंचने से लाचार थे। उन्होंने आवाहन किया तो गंगा प्रकट हुईं और वह उसमें समा गए। वह तिथि थी कार्तिक धवल त्रयोदशी। इस तिथि को देशभर में मैथिल समुदाय हर साल विद्यापति स्मृति पर्व मनाता है।


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