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स्वतंत्र पत्रकारिता की कीमत जान देकर चुका रहे हैं पत्रकार... (World Press Freedom Day)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मई 3 , 2018 , 11:58 IST

हम सभी जानते हैं कि तीन मई को वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे मनाया जाता है। इसकी शुरुआत पहली बार 1993 में हुई थी। जिसका मकसद था दुनियाभर में स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करना और इसकी रक्षा करना। स्वतंत्र पत्रकारिता पर होने वाले हमलों से मीडिया और पत्रकारों को बचाने के लिए इसकी शुरुआत की गई थी।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का उद्देश्य प्रेस की आज़ादी के महत्व के प्रति जागरुकता फैलाना है लेकिन इस दिन यह महसूस करना भी महत्वपूर्ण है कि वैश्विक राजनीति में जैसे-जैसे मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती जाती है उसके साथ ही यह परिभाषित करना जरूरी है कि हम सोचें कि आज की स्थितियों में एक पत्रकार होने का क्या अर्थ है ? यह भी सोचें कि प्रति वर्ष मीडिया की ताकत बढ़ने की बात कही जाती है लेकिन इसका विरोध और भी हिंसक होता जा रहा है।

भारत में 2018 के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता में कमी आई है और इस दौरान प्रथम चार महीनों में तीन पत्रकारों की हत्या हुई है। मीडिया वॉचडाग 'द हूट' ने अपनी रपट में यह जानकारी दी है। द हूट ने कहा है कि 'पत्रकारों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।'

द हूट की रपट के अनुसार, "प्रथमदृष्ट्या जांच के आधर पर, पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिग के संबंध में मारा जा रहा है।"

इस वर्ष जारी विश्व प्रेस सूचकांक के अनुसार 180 देशों में भारत 138वें स्थान पर था। 2017 में भारत 136वें और 2016 में 133वें स्थान पर था।


रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान पूरे देश में पत्रकारों और मीडिया कर्मियों पर हुए हमलों की संख्या 13 है, जिसमें से तीन पश्चिम बंगाल में हुआ। वर्ष 2017 में, 46 लोगों पर हमले किए गए थे।

द हूट ने कहा है, "इसके अलावा, एक पत्रकार पर मानहानि का मामला भी दर्ज किया गया। वहीं एक पत्रकार पर राजद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया। यह स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि राज्य, केंद्र और न्यायपालिका नियामक नीतियों व न्यायिक आदेशों से बोलने की आजादी को कुचल रहे हैं।"

द हूट ने कहा है, "2018 के प्रथम चार महीनों के दौरान भारत में मीडिया की स्वतंत्रता में कमी आई। इस दौरान 50 बार सेंसरशिप और 20 बार इंटरनेट स्थगित करने के प्रयास किए गए। यहां तक कि कई बार ऑनलाइन कंटेंट को भी हटाया गया।"

तीनों पत्रकार जनवरी से अप्रैल महीने के दौरान वाहनों से कुचल कर मारे गए।

दैनिक भास्कर के दो पत्रकार नवीन निश्चल और विजय सिंह के बाइक को 26 मार्च को बिहार के भोजपूर में एक एसयूवी ने टक्कर मारी, जिससे दोनों की मौत हो गई।

पुलिस ने कहा कि वाहन गांव का एक नेता चला रहा था और एक न्यूज रिपोर्ट को लेकर दोनों के बीच तीखी बहस हो गई, जिसके बाद इस घटना को अंजाम दिया गया।

द हूट की रिपोर्ट के अनुसार, "घटना के एक दिन बाद, एक टीवी संवाददाता संदीप शर्मा को मध्यप्रदेश के भिंड में एक ट्रक ने कुचल दिया। संदीप ने भिंड में रेत माफिया के खिलाफ एक स्टिंग ऑपरेशन किया था और उसने पुलिस को बताया था कि उसे जान से मारने के धमकी भरे कॉल मिल रहे हैं।"

हूट की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि राजनीतिज्ञ, व्यापारी, हिंदू दक्षिणपंथी समूह, पुलिस, अर्धसैनिक बल, सरकारी एजेंसियां जैसे फिल्म प्रमाणन बोर्ड, सूचना व प्रसारण मंत्रालय, राज्य सरकार, वकील और यहां तक कि मीडिया समूह भी अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने के प्रयास कर रहे हैं।

द हूट की रिपोर्ट में कहा गया है, "अभिव्यक्ति की आजादी पर कई तरह के हमले के बावजूद मौजूदा संघर्ष ने इन अवरोधों के खिलाफ लड़कर अच्छे परिणाम दिए हैं।"

पत्रकारों में भय का माहौल-

विश्व में पत्रकारों के हत्याओं के मामले में 57 फीसदी वृद्धि हुई हैं। इन लगातार हमलों से मीडियाकर्मियों और पत्रकारों में भय का माहौल बनाया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2018 में अब तक 13 पत्रकारों पर हमलें हो चुके हैं। वही 2017 में 46 पत्रकारों पर हमलें हुए थे।

अफगानिस्तान में पत्रकारों पर ज्यादा हमले-

यदि विश्व की बात करें तो अफगानिस्तान इस मामलें में सबसे ज्यादा ऊपर हैं। यहां सबसे ज्यादा 11 जर्नलिस्टों की हत्याएं हुई हैं। वही मेक्सिको और सीरिया में 4-4 यमन में 3 और पाकिस्तान में 2 पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

सूचना का अधिकार क़ानून-

समूचे विश्व में सूचना तक सुलभ पहुंच के बारे में बढ़ती चिंता को देखते हुए 'भारतीय संसद' द्वारा 2005 में पास किया गया 'सूचना का अधिकार क़ानून' बहुत महत्व्पूर्ण हो गया है। इस क़ानून में सरकारी सूचना के लिए नागरिक के अनुरोध का निश्चित समय के अंदर जवाब देना बहुत जरूरी है। इस क़ानून के प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी नागरिक सार्वजनिक अधिकरण (सरकारी विभाग या राज्या की व्यनवस्था ) से सूचना के लिए अनुरोध कर सकता है और उसे 30 दिन के अंदर इसका जवाब देना होता है। संसद में 15 जून, 2005 को यह क़ानून पास कर दिया था, जो 13 अक्टूबर, 2005 से पूरी तरह लागू हो गया

'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे' की शुरुआत-

'अंतर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस' मनाने का निर्णय वर्ष 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर किया था। इससे पहले नामीबिया में विन्डंहॉक में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था कि प्रेस की आज़ादी को मुख्य रूप से बहुवाद और जनसंचार की आज़ादी की जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। तब से हर साल '3 मई' को 'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

भारत जैसे दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक जरूरत है। आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां अपनी दुनिया से बाहर निकल कर आसपास होने वाली घटनाओं के बारे में जानने का अधिक वक्त हमारे पास नहीं होता। ऐसे में प्रेस और मीडिया हमारे लिए एक ख़बर वाहक का काम करती हैं, जो हर सवेरे हमारी टेबल पर गरमा गर्म खबरें परोसती हैं। यही खबरें हमें दुनिया से जोड़े रखती हैं। आज प्रेस दुनिया में खबरें पहुंचाने का सबसे बेहतरीन माध्यम है।


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