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प्रथम विश्व युद्ध: 74,000 भारतीय हुए शहीद, दुनिया याद कर रही है उनकी वीरता (खास रिपोर्ट)

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| नवंबर 11 , 2018 , 16:54 IST

आज से ठीक 100 साल पहले 11 नवंबर 1918, इतिहास में दर्ज वह तारीख है जब चार साल तक दुनिया को हिलाकर रख देने वाला प्रथम विश्व युद्द आखिर थम चुका था। वह जो समय था जब भारत में समुद्र यात्रा को भी अशुभ माना जाता था, उस वक्त कुछ हजार या 2-4 लाख नहीं, बल्कि 11 लाख भारतीय सैनिक प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा ले रहे थे। इन सैनिकों ने समंदर पार दूसरे देशों में अपने शौर्य, पराक्रम और जांबाजी का लोहा मनवाया। चार साल तक चले प्रथम विश्व युद्ध में करीब 74 हजार भारतीय सैनिक शहीद हुए। करीब 70 हजार अन्य भारतीय जख्मी हुए। आज प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति की 100वीं सालगिरह पर दुनियाभर में उनकी शहादत को याद किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी प्रथम विश्व युद्ध के भारतीय शहीदों को याद किया है। भारतीय सपूतों की वीरता की कहानी को आईए जानते है...

ब्रिटेन ने युद्ध में झोंक डाले भारतीय सैनिक

104 साल पहले भारतीयों के लिए समुद्र यात्रा को लेकर सकारात्मक माहौल नहीं था। सामाजिक मान्यताओं के कारण लोग समुद्र मार्ग से यात्रा करना अशुभ मानते थे। आज के इतिहास में जिस घटना को दुनिया प्रथम विश्व युद्ध कहती है, उसके लिए लाखों अविभाजित हिंदुस्तानी नागरिकों को जिन्हें युद्ध कौशल में प्रशिक्षित भी नहीं किया गया था, को बड़े समुद्री जहाजों के जरिए युद्ध में भाग लेने के लिए ईस्ट अफ्रीका, फ्रांस, मिस्र, पर्शिया जैसे देशों में भेज दिया गया। 11 नवंबर को दुनिया प्रथम विश्व युद्ध के समापन के तौर पर जानती है, जिसमें ब्रिटिश हुकूमत की जीत हुई थी।

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4 सालों तक चला दुनिया का सबसे विनाशकारी युद्ध

28 जुलाई 1914 को शुरू हुआ प्रथम विश्व युद्ध 11 नवंबर 1918 तक चला। इस तरह यह 4 साल, 3 महीने और 2 हफ्ते तक चला। इसे अबतक का सबसे विनाशकारी युद्ध भी माना जाता है। प्रथम विश्व युद्ध में करीब 90 लाख सैनिकों और 70 लाख आम नागरिकों की मौत हुई थी। इसमें 30 से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया।

13 लाख भारतीयों ने युद्ध में लिया हिस्सा

प्रथम विश्व युद्ध में भारत प्रत्यक्ष हिस्सेदार नहीं था, लेकिन अविभाजित भारत की इस युद्ध में भागीदारी जरूर थी। भारत से 13 लाख से अधिक आदमी और 1.7 लाख से अधिक जानवरों को युद्ध क्षेत्र में भेजा गया। इस युद्ध में 74,000 भारतीय सैनिक शहीद भी हुए और आज के रुपए की गणना में 20 बिलियन डॉलर से ज्यादा का धन भारत से युद्ध क्षेत्र में खर्च किया गया।

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प्रशिक्षण के बिना ही सैनिक के तौर पर तैनात किया गया

इस युद्ध में भारत के लिहाज से सबसे अधिक चिंताजनक बात थी कि युद्ध के लिए भेजे गए बहुत से भारतीयों को जरूरी कौशल प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था। हालांकि, युद्ध में भेजी गई कुछ टुकड़ियां प्रशिक्षित थीं और उनकी साहसिक भागीदारी इतिहास में पूरे सम्मान के साथ याद की जाती हैं। मैसूर और जोधपुर लैंसर्स की टुकड़ियों ने जबरदस्त वीरता का परिचय दिया और हाईफा विजय के लिए इजरायल आज भी उनका आभार मानता है। पश्चिमी क्षेत्र में भारतीय सैनिकों की साहसिक भागीदारी को लेकर कोई दो राय नहीं है।

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भारतीय टुकड़ी में कई धर्म-जाति के लोग थे

अविभाजित भारत से जिस जत्थे को युद्ध के लिए भेजा गया था वह बहुआयामी था। उसमें कई जाति, अलग-अलग भाषा बोलनेवाले शिक्षित, निरक्षर और अलग धार्मिक मान्यताओं वाले सैनिक थे। यही वजह रही कि भारतीय सैनिकों के लिखित दस्तावेज कम मिले। हालांकि, ब्रिटिश लाइब्रेरी में एक अनाम सैनिक का पत्र हाल ही में सार्वजनिक हुआ है, जिसमें सैनिक ने युद्ध की भयावहता की तुलना महाभारत के युद्ध से की। एक मुस्लिम सैनिक मौलवी सरदुद्दीन ने मुस्लिम सैनिकों के शव को धार्मिक तौर-तरीकों से दफन किए जाने की मांग भी पत्र में की है।

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100 साल बाद दफनाए गए 2 भारतीय सैनिक

उत्तरी फ्रांस के लावंटी गांव में 100 साल बाद द्वितीय विश्व में भाग लेने वाले दो भारतीय सैनिकों के शव दफनाए गए थे। 2016 में एक नाले के चौड़ीकरण के दौरान दो अज्ञात भारतीय सैनिकों के शव मिले थे। ये शव उस क्षेत्र से 8 किलोमीटर दूर मिले, जहां प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गबर सिंह नेगी 10 मार्च 1915 को शहीद हुए थे।

गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट सेंटर के लैंड्सडाउन स्थित मुख्यालय में तैनात लेफ्टिनेंट कर्नल रितेश राय के अनुसार फ्रांस सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक उत्तर पश्चिम फ्रांस के एक भूखंड में खुदाई के दौरान मिले 4 सैनिकों के शवों में से 2 शव 39 गढ़वाल राइफल रेजिमेंट के जवानों के थे। उनके कन्धों से '39' बैज मिला था। खुदाई में 4 सैनिकों के अवशेष मिले थे। इनमें 1 जर्मन और 1 ब्रिटिश सैनिक का शव था। ले. कर्नल रितेश राय के अनुसार स्थानीय प्रशासन की जांच में पता चला कि भारतीय सैनिकों के कंधों पर मिले बैज में 39 अंकित है।

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यह है '39' का मतलब

प्रथम विश्वयुद्ध के वक्त गढ़वाल राइफल्स 39 गढ़वाल राइफल्स के नाम से जानी जाती थी। युद्ध में गढ़वाली सैनिकों की वीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इसका नाम 39 रॉयल गढ़वाल राइफल्स कर दिया था। आजादी के बाद इसमें से रॉयल शब्द हटा दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध में यह गढ़वाली जवानों का शौर्य ही था कि गढ़वाल राइफल्स को रॉयल के खिताब से नवाजा गया। फ्रांस में हुए युद्ध में नायक दरबान सिंह नेगी और राइफल मैन गबर सिंह को मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया, जबकि संग्राम सिंह नेगी को 'मिलिटरी क्रॉस अवार्ड' दिया गया।

गढ़वाल रेजिमेंट के 721 जवानों ने दी कुर्बानी

जहां तक प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों का सवाल है, इन दोनों में गढ़वाल रेजिमेंट के जवानों ने अपनी कुर्बानी दी थी। प्रथम विश्वयुद्ध में 721 सैनिको ने प्राणों की आहुति दी ,वहीं द्वितीय विश्वयुद्ध में देश के नाम जिंदगी कुर्बान करने वाले सैनिकों की संख्या 349 बताई जाती है।

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ब्रिटिश पीएम और महारानी ने भी याद की भारतीयों की कुर्बानी

1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध में अविभाजित हिंदुस्तान के हजारों सैनिकों ने हिस्सा लिया था। युद्ध समाप्ति के दिन को कॉमनवेल्थ देशों में इसे एक ऐतिहासिक दिन के तौर पर याद किया जाता है। इस युद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका को पूरी दुनिया में सम्मान के साथ याद किया जाता है। रविवार को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों को याद किया। पिछले सप्ताह ब्रिटेन की संसद में प्रधानमंत्री टरीजा मे ने भी भारतीय सैनिकों को याद किया।

उन्होंने कहा, 'हम इस युद्ध विजय में उन 74,000 सैनिकों को नहीं भूल सकते जो अविभाजित भारत के नागरिक थे। उन सैनिकों ने संघर्ष किया और अपनी जान गंवाई, इनमें से 11 को उनके अदम्य साहस के लिए विक्टोरिया क्रॉस से भी सम्मानित किया गया।'


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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